तीन तलाक के मसले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी संविधान में वर्णित लैंगिक न्याय व समानता के अधिकार को ही प्रतिबिंबित करती है। दो याचिकाओं की सुनवाई करते हुए गुरुवार को अदालत ने तीन तलाक की प्रथा को गैर-संवैधानिक करार दिया। हालांकि यह फैसला नहीं है। हाइकोर्ट ने शायद इसे जान-बूझ कर फैसला कहने से बचना चाहा होगा, क्योंकि इस विषय से संबंधित कुछ याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। लेकिन ध्यान देने की बात है कि इलाहाबाद हाइकोर्ट का रुख कोई अपवाद नहीं है। उसने किसी समुदाय से संबंधित निजी कानून के औचित्य पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया है। उसने सिर्फ यह कहा है कि कोई निजी कानून संविधान में दिए गए मौलिक नागरिक अधिकार का अतिक्रमण नहीं कर सकता। यही तर्क मुंबई उच्च न्यायालय का भी था, जब उसने शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह, दोनों जगहों पर स्त्रियों पर चली आ रही पाबंदी हटाने का आदेश सुनाया था। दोनों मामलों में पाबंदी के समर्थकों और संबंधित धार्मिक स्थानों के न्यासियों व प्रबंधकों का कहना था कि पाबंदी परंपरा से चली आ रही है और वह कुछ विशेष धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है; इसमें दखल देना संविधान से प्रदत्त धार्मिक स्वायत्तता का हनन होगा। लेकिन अदालत ने यह दलील खारिज कर दी, यह कहते हुए कि धार्मिक स्वायत्तता की एक सीमा है, वह संविधान से हासिल किसी नागरिक अधिकार को बेदखल नहीं कर सकती।
यही रुख तीन तलाक मामले में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने भी अपनाया है। साथ ही उसने यह भी कहा है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। संदेश साफ है कि बोर्ड ऐसे अधिकार के आड़े नहीं आ सकता, जो संविधान ने देश के सभी नागरिकों को दिए हैं। याद रहे, बोर्ड ने बाकायदा एक प्रस्ताव पारित करके कहा था कि मुसलिम निजी कानून न्यायिक समीक्षा से परे हैं। पर बोर्ड को यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा संविधान किसी भी प्रकार के लैंगिक भेदभाव की इजाजत नहीं देता; साथ ही उसमें कानून के समक्ष समानता का प्रावधान भी है। निजी कानूनों में सबसे विवादास्पद मुद्दा मुसलिम पर्सनल लॉ का तीन तलाक का प्रावधान या रिवाज रहा है, क्योंकि यह मुसलिम समाज में पुरुष को तलाक के मामले में मनमाना और एकतरफा अधिकार देता है।
शरीआ या कुरान का हवाला देकर इसका बचाव नहीं किया जा सकता, जैसा कि आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई अन्य मुसलिम संगठन करते आए हैं।
यह गौरतलब है कि अब मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठने लगी है, जैसा कि भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन नामक समूह की गतिविधियों और हाइकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं से भी जाहिर है। निजी कानूनों के पीछे पारंपरिक और धार्मिक आधार जरूर रहे हैं, पर वे अकाट्य नहीं हैं न वे देश के संविधान से ऊपर हो सकते हैं। खुद अनेक इस्लामी देशों ने निजी कानूनों को बदली हुई परिस्थितियों के मुताबिक ढाला और प्रगतिशील बनाया है। भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? अलबत्ता इसकी पहल इस ढंग से होनी चाहिए कि वह एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय को भड़काने जैसा न लगे। इस तरीके से ही तीन तलाक के रिवाज या प्रावधान को हटाने के पक्ष में मुसलिम समाज में अधिक से अधिक जनमत बनाया जा सकता है। इससे एक तरफ कट््टरपंथी समूहों के दबदबे से निजात मिलेगी, वहीं ध्रुवीकरण का मंसूबा भी नाकाम होगा।

