मोहम्मद अरशद खान
होती होंगी परियां, जरूर होती होंगी। तभी तो पुराना पाकड़ एकाएक हरा-भरा हो उठा है। जैसे किसी ने आकर रातों-रात हरे-हरे चमकदार पत्ते डाली-डाली पर टांक दिए हों।’ प्रत्यूष पेड़ को देखता और सोचता चला जा रहा था। स्कूल के रास्ते में पड़ने वाले पाकड़ को देखना उसे बहुत अच्छा लगता था। जाने कितने बरसों से वह खड़ा था। उसकी ऐंठी हुई मोटी-मोटी डालें ऐसी थीं कि उन पर कोई बेसुध होकर सो जाए तो भी न गिरे।
सर्दियां उतार पर थीं। अभी कुछ दिन पहले थपेड़े मार-मारकर पछुआ चल रही थी। माली चाचा बता रहे थे कि यह हवा ढीठ पत्तों को गिराने के लिए चलती है। जो लोग अपनी जरूरत खत्म हो जाने पर भी अड़े रहते हैं और आनेवालों को जगह नहीं देते, उन्हें ऐसे ही धक्के खाकर हटना पड़ता है। घनी छायावाला वह पाकड़ जिसके नीचे धूप भी आकर सांवली हो जाती थी, दो दिन के झकोरों में ही ठूंठ हो गया। डालियों में फंसी बेरंग हो चुकी पतंगें, डोर-लंगड़, पुराने चीथड़े सब एकाएक सामने आ गए। कितना कुछ छिपा रखा था उसने। जल्द ही डालियों में छोटे-छोटे टूसे आए। टूसों में से लाल-लाल कोंपलें फूटीं। फिर उन पर किसी ने हौले-हौले मानो हरा रंग पोत दिया। ऐसा कचोक हरा कि आंखें उसी में डूब जाएं।
प्रत्यूष पाकड़ के नीचे जाकर खड़ा हो गया। कोमल पत्ते लहरा-लहराकर उसका स्वागत कर रहे थे। उसे लगा पेड़ बहुत खुश है, उतना ही जितना नए कपड़ों के पहनने पर वह होता है। हरे-भरे पत्तों के कारण आस-पास वातावरण भी हरा-हरा-सा हो गया था। प्रत्यूष को किसी किताब में पढ़ी हुई एक कविता याद आ गई। वह गुनगुनाने लगा-
-हरे-हरे पेड़ों के नीचे हरी हो गई धूप
कुछ खट्टी-कुछ मीठी ज्यों रसभरी हो गई धूप।
धूप..! सचमुच खटमिट्ठी रसभरी ही तो हो गई है धूप। बचकर छांह में आओ तो तन झुरझुराए, सामने पड़ो तो तीर जैसी चुभे। उसने फिर गुनगुनाया-‘कुछ खट्टी-कुछ मीठी ज्यों रसभरी हो गई धूप।’
प्रत्यूष अपनी मस्ती में आगे बढ़ा चला जा रहा था। जिधर नजर जाती झूमती हुई हरियाली दिखाई देती। पेड़-पौधों पर जैसे किसी ने हरा रंग उड़ेल दिया था। प्रत्यूष पुलकित हो उठा। लगा उसके मन में भी जैसे कोई पौधा लहलहाकर बड़ा हो रहा है। हरे-हरे, कोमल और चिकने पत्तोंवाला, जिसे हवा दुलरा रही है, जिस पर बैठी कोयल कुहुक रही है।
थोड़ी ही दूर पर पेड़ों के झुरमुट में एक महुआ उदास-सा खड़ा था। उसके पुराने पत्ते, जिन पर धूल जमी हुई थी, हवा के झकझोरने पर भी हिलने-डुलने में सकुचा रहे थे। आस-पास के पेड़ हरियाली का उत्सव मना रहे थे पर महुआ उस गरीब बच्चे की तरह खड़ा हुआ था जिसे त्योहार में भी नए कपड़े नसीब न हुए हों।
‘यह जरूर आलसी होगा।’ प्रत्यूष सोचने लगा, ‘हां-हां, आलसी ही होगा। तभी तो सोता रह गया और बाकी सारे पेड़ अपने हिस्से की हरियाली बटोर लाए। भला कोई पेड़ गरीब कैसे हो सकता है? प्रकृति तो बिना भेदभाव के सबको बराबर हवा-पानी देती है। पेड़ हम आदमियों की तरह थोड़े ही होते हैं कि दूसरों के हिस्से पर नजर रखें। इसके हिस्से की हरियाली तो भगवान ने बचा रखी होगी। यह आलसी खुद ही लेने नहीं गया होगा।’
प्रत्यूष उस दिन समय पर स्कूल से लौटा जरूर पर उसका मन वहीं पाकड़ की हरियाली में अटक गया। उसका मन तितली बन गया था और डाल-डाल पर, पत्तों-पत्तों पर थिरक रहा था। चिड़ियों से बातें कर रहा था और लाल चीटों और खुरदुरी पीठवाले मटमैले कीट से चुहलबाजी कर रहा था। उन घने पत्तों के बीच में जैसे कोई नई दुनिया बसी थी। अद्भुत और अनोखी। इसी खयाल में प्रत्यूष की आंखें कब झपक गर्इं, पता ही न चला।
अभी वह सपनों की दुनिया में खोया ही था कि अब्बास की आवाज सुनकर चौंक गया। हमेशा की तरह अब्बास गेट के सामने साइकिल लिए खड़ा था। पर आज वह खेलने का बुलावा लेकर नहीं आया था। उसके चेहरे पर घबराहट थी और माथे पर पसीने की बूंदें झिलमला रही थीं। आंखें ऐसी हो रही थीं कि अब टपकीं कि तब।
‘क्या हुआ?’ प्रत्यूष घर के कपड़ों में ही निकलकर बाहर आ गया।
अब्बास कुछ न बोला। बस, उसका हाथ पकड़ा और उस तरफ भाग चला जहां पाकड़ का पेड़ था। प्रत्यूष हैरान। भागते-भागते उसने देखा कि आस-पास की हरियाली धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। पेड़ मुरझाए, कुम्हलाए और ठूंठ होते जा रहे हैं। नीला आसमान मटमैला, धुआंया-सा हो गया है। जैसे पीली आंधी आनेवाली हो। प्रत्यूष को समझ में नहीं आ रहा था यह सब क्या हो रहा है।
भागते-भागते अब्बास रुक गया। प्रत्यूष कुछ पूछता कि वह सामने की ओर इशारा करता हुआ चीख-चीखकर रोने लगा रहा, ‘प्रत्यूष, मेरे भाई, हमारा हरा-भरा पाकड़ सुलग रहा है। एक-एक पत्ता पीला पड़ता जा रहा है। प्रत्यूष, कुछ करो। वर्ना यह पाकड़, यह हरियाली, यह खुशियां सब खत्म हो जाएंगी।’
प्रत्यूष ने सामने निगाह डाली तो हैरान रह गया। सचमुच पाकड़ सुलग रहा था। उसका धुआं चारों ओर फैल रहा था। जिस-जिस चीज को वह धुआं छू रहा था, वह सूखता जा रहा था। हरे पत्ते सूखकर ऐसे ऐंठ रहे थे कि मुट्ठी में भींच लो तो चूरा बन जाए।
‘प्रत्यूष कुछ करो वर्ना, यह धुआं हमारे मुहल्ले, हमारे शहर और पूरे देश में फैल जाएगा। सब खत्म हो जाएगा। दुनिया से हरियाली का नोमानिशान मिट जाएगा।’ अब्बास फूट-फूटकर रो रहा था।
अचानक प्रत्यूष दौड़ा। पाकड़ के पास एक छोटे से पोखरे में पानी भरा हुआ था। प्रत्यूष मिट्टी-कीचड़ की परवाह न करते हुए पोखरे में उतर गया और अंजुलियों से भर-भरकर पानी पेड़ पर उलीचने लगा। पीछे-पीछे अब्बास भी कूद आया और उसकी मदद करने लगा। प्रत्यूष चिल्लाता जा रहा था, ‘कुछ भी हो जाए मैं इस हरियाली को बचाकर रहूंगा। मैं इसे नष्ट नहीं होने दूंगा। ऐसा नहीं हो सकता। मेरा पाकड़ सूख नहीं सकता।’
‘प्रत्यूष, बेटा तुम दिन में भी सपने देखने लगे’, मम्मी ने उसे नींद में बड़बड़ाते देखकर झकझोरा।
प्रत्यूष हड़बड़ाकर उठ बैठा। सारा शरीर पसीने में नहाया हुआ था। उठते ही वह लपककर खिड़की के पास पहुंचा। लॉन में लगे कचनार की हरी-भरी डाल हौले से उसके गाल को छू गई। उसने चारों तरफ आंखें फाड़-फाड़कर देखा। सब कुछ वैसा ही हरा-भरा था। सामने लगा नीम, अशोक और कनेर मस्त होकर बेफिक्री से झूम रहे थे।
प्रत्यूष ने माथे का पसीना पोंछा और ठंडी सांस भरी। उसने संतोष की सांस भरी कि यह सपना ही था। ०
