पिछले साल आई फिल्म ‘फैन’ के कुछ दृश्यों में दिखाया गया था कि कैसे अभिनेता शाहरुख खान के प्रशंसक उनकी एक झलक पाने के लिए उनके घर के बाहर बड़ी तादाद में खड़े इंतजार करते रहते हैं। कई बार भगदड़ जैसी स्थिति भी बनती है। फिल्म के उन दृश्यों को पूरी तरह काल्पनिक नहीं कहा जा सकता। यह इससे भी साफ हुआ कि सोमवार की रात जब शाहरुख खान अपनी नई फिल्म के प्रचार के सिलसिले में ट्रेन से वडोदरा स्टेशन पहुंचे तो उनके प्रशंसकों की भारी भीड़ बेकाबू हो गई और वहां मची अफरा-तफरी में एक व्यक्ति की दम घुटने से जान चली गई। वे सफाई दे सकते हैं कि अगर वह भीड़ अनियंत्रित हो गई, तो उसमें उनका कोई कसूर नहीं है। लेकिन सवाल है कि जब शाहरुख खान के लिए ऐसी स्थितियों का सामना करना रोजमर्रा की बात है, तो क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि अपनी फिल्म के प्रचार के लिए जो तरीका उन्होंने अपनाया, उसमें उन्हें देखने के लिए जुटने वाली भीड़ कभी भी बेकाबू हो सकती थी? क्या अपने घर के सामने जमा भीड़ को अपनी एक झलक देते समय भी वे सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर इतने ही लापरवाह होते हैं!
कठघरे में प्रशासन भी है कि जब शाहरुख खान को देखने के लिए जमा होने वाले लोगों की भारी तादाद के बारे में पहले से अंदाजा था तो समय रहते भीड़ को नियंत्रित करने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसने क्या इंतजाम किए! शाहरुख को देखने के लिए बेताब लोगों ने बेलगाम होने के बाद जब ट्रेन की खिड़कियों के शीशे तोड़ने शुरू कर दिए तब पुलिस ने अचानक लाठी चार्ज कर दिया। सवाल है कि जब रेलवे प्लेटफार्म जैसी जगहों पर प्रचार के इस तरीके पर रोक नहीं लगाई जा सकी तो ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की गई कि लोग ट्रेन से दूरी बनाए रखते? अब भले मृतक के परिवार ने इस घटना के लिए शाहरुख खान को जिम्मेदार मानने और कोई शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया और शाहरुख ने इस घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बता कर अफसोस जताया है, लेकिन उन्हें सोचने की जरूरत है कि अगर वे अपने प्रशंसकों के बीच इस कदर लोकप्रिय हो गए हैं, तो क्या उन्हें ऐसे हालात पैदा करने की छूट मिल जाती है कि उनकी एक झलक पाने की हसरत में किसी की जान जाने तक की नौबत आ जाए?
सवाल यह भी है कि हाल के दिनों में फिल्मों के प्रचार के तौर-तरीकों में जो बदलाव आया है और उसमें ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का सहारा लिया जाने लगा है, वह कितना उचित है। फिल्मों के व्यावसायिक पहलू के मद्देनजर ज्यादा से ज्यादा लोगों को फिल्म की ओर खींचने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन यह प्रचार अगर फिल्म के प्रदर्शन की सूचना के प्रसार के बजाय झूठी चकाचौंध या फिर किसी न किसी तरह का विवाद पैदा करके किया जाता है तो उस पर सवाल उठेंगे। कथानक और प्रस्तुति की गुणवत्ता के आधार पर दर्शकों के बीच उसकी स्वीकृति और लोकप्रिय होने पर भरोसा करने के बजाय किसी ‘रियलिटी शो’ की तरह फिल्म के प्रचार को लोगों पर थोपने की कोशिश की जाती है। प्रचार की आक्रामकता सामान्य लोगों को आकर्षित जरूर कर सकती है, लेकिन उन्हें विश्लेषण के इस स्तर पर नहीं जाने देती कि वे बेहतर और कमतर के सवाल पर सोच सकें।
