केरल के मंजेरी में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के प्रथम वर्ष के छात्रों के साथ रैगिंग के नाम पर जो बर्ताव हुआ वह बेहद दुखद और लज्जा का विषय है। विडंबना है कि यह वाकया ऐसे राज्य में हुआ जो देश का सबसे शिक्षित राज्य है और सबसे ज्यादा प्रगतिशील भी समझा जाता रहा है। आमतौर पर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग की बहुत-सी घटनाएं दबा दी जाती हैं या पीड़ित छात्र और अधिक उत्पीड़न के भय से खुद ही छिपा जाते हैं। लेकिन इस मामले में भुक्तभोगी छात्रों ने थोड़ी हिम्मत दिखाई और चालीस छात्रों ने संयुक्त रूप से शिकायत की, तब कहीं जाकर कॉलेज प्रशासन हरकत में आया। शिकायत के मुताबिक पीड़ित छात्रों को द्वितीय और तृतीय वर्ष के छात्रों ने छात्रावास में जबरन नंगा कराया, उनसे शौचालय साफ कराया और उन्हें गंदा पानी पीने पर मजबूर किया।
फिलहाल कॉलेज प्रशासन ने इक्कीस छात्रों को निलंबित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि रैगिंग को लेकर न केवल सर्वोच्च न्यायालय बल्कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी कई बार चिंता जता चुका है। इसके बावजूद अगर रैगिंग का रोग खत्म नहीं हो रहा है तो इसकी तह में जाकर सोचने की जरूरत है। कुछ दिन पहले केरल के ही कोट्टायम जिले में एक सरकारी पॉलीटेकनिक संस्थान के छात्रावास में कुछ छात्रों के साथ रैगिंग की घटना हुई थी। इस मामले में भी आठ छात्र निलंबित किए गए थे। होता यह है कि दोषी छात्रों की थोड़ी छानबीन के बाद अक्सर ऐसे मामले वापस ले लिये जाते हैं। जबकि जरूरत है कड़ी कार्रवाई करने की। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि आरके राघवन समिति की रिपोर्ट को जल्द लागू किया जाए। तब भी मामला केरल का था, केरल विश्वविद्यालय का। समिति के मुताबिक रैगिंग करने वाले छात्र के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट होनी चाहिए, और इसकी जिम्मेदारी कॉलेज या विश्वविद्यालय प्रशासन की होगी। रैगिंग को रोकने में असमर्थ संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई होगी। यह कानून सरकारी और निजी दोनों संस्थानों पर लागू होगा।
यों तो देश में रैगिंग के शिकार छात्रों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, लेकिन हमें 2009 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित मेडिकल कॉलेज के छात्र अमन को नहीं भूलना चाहिए, जहां रैगिंग के दौरान उसकी मौत हो गई थी। इस घटना को लेकर सुर्खियां बनी थीं, और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर काफी सख्ती दिखाई थी। बाद में महान्यायाभिकर्ता (सॉलिसिटर जनरल) ने अमन के पिता को भरोसा दिलाया था कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी। इसके बाद भी, चिंता की बात यह है कि सभी शैक्षिक संस्थाओं के कार्यालयों पर सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश तो टंगा दिखाई देता है कि किसी भी किस्म की रैगिंग गैर-कानूनी और दंडनीय है, लेकिन वास्तव में इस पर अमल नहीं होता। अक्सर छात्रावासों में जूनियर छात्र और छात्राएं अपने उत्पीड़न की मौखिक शिकायतें कॉलेज के शिक्षकों से करते रहते हैं, लेकिन जब तक कोई बड़ी घटना नहीं घटती, शिक्षक और कॉलेज प्रशासन ऐसी बातों की अनदेखी करते रहते हैं। जब तक संस्थाओं के विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक इस पर रोक लगना कठिन ही दिखाई देता है।
