दावा हम कितना भी कर लें, तथ्य यह है कि अपने देश को अभी तक पर्यटकों के लिए निरापद नहीं बना पाए हैं। विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार, बलात्कार, मारपीट, लूटपाट की एक घटना पुरानी नहीं पड़ती कि नई वारदात फिर हो जाती है। आगरा के चर्चित ऐतिहासिक स्थल में एक स्विस जोड़े के साथ हुई मारपीट की घटना की जितनी निंदा की जाए, कम है। यह एक लज्जाजनक स्थिति है, जहां दुनिया के मंच पर हमारे पास देने के लिए कोई जवाब नहीं बचता। विडंबना है कि यह सब तब हुआ जब भारत सरकार पूरे देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन पर्व का आयोजन कर रही थी। हुआ यों कि स्विस नागरिक क्वैंटीन जेरेमी क्लेर्क और उनकी महिला मित्र मैरी ड्रोज 30 सितंबर को भारत पर्यटन करने आए थे। इसी क्रम में बीते रविवार को फतेहपुर सीकरी घूमने गए थे। वहां रेलवे स्टेशन पर कुछ युवकों ने उनका पीछा किया। वे मैरी ड्रोज के साथ सेल्फी लेने की जिद करने लगे। क्लेर्क ने उनका विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि उन असामाजिक तत्त्वों ने दोनों पर्यटकों को मारपीट कर घायल कर दिया। क्लेर्क ने कहा है कि उन्हें ज्यादा पीड़ा इससे हुई कि बीच-बचाव करने के बजाय लोग घटना की तस्वीर उतारने और वीडियो बनाने में व्यस्त थे। फिलहाल, दोनों पर्यटकों को दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। क्लेर्क को चोट की वजह से अभी सुनने में परेशानी हो रही है।
घटना का चिंताजनक पहलू यह है कि स्थानीय पुलिस ने पुलिस महानिदेशालय को अंधेरे में रखा, और समय से सूचना तक नहीं दी। जबकि किसी विदेशी पर्यटकों के मामले को अतिसंवेदशील श्रेणी में रखा गया है और स्थानीय पुलिस की पहली जिम्मेदारी है इससे पुलिस मुख्यालय को अवगत कराए। इस घटना की जानकारी भी तब आम हुई, जब अगले दिन पर्यटन पर्व का समापन समारोह मनाया जा रहा था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है और उन्होंने प्रदेश सरकार से इस बारे में रिपोर्ट तलब की है। लेकिन क्या घटना के गुजर जाने के बाद यही सब कर देना पर्याप्त रहता है। आए दिन ऐसी घटनाएं अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। इसी साल जून में दिल्ली में उज्बेकिस्तान की छब्बीस साल की युवती के साथ बलात्कार की घटना अभी तक चर्चा में है। 2016 में फरवरी में नीदरलैंड की युवती के साथ मध्यप्रदेश में दुष्कर्म किया गया, जिसमें दो होमगार्डों को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह, जनवरी 2015 में बिहार के गया जिले में एक जापानी युवती से बलात्कार किया गया।
गौरतलब है कि यह सब कब तक चलता रहेगा और हमारी सरकार कब तक लोगों को सुरक्षा का झांसा देती रहेगी। एक तरफ हम अतिथि देवो भव: का आलाप करते नहीं थकते। यहां तक कि वर्ष 2003 में भारत के पर्यटन मंत्रालय ने इस सूक्ति को अतुल्य भारत का नारा बना दिया था। तब से लेकर यह भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किसी मंत्र की तरह दोहराया जाता है। मगर वारदात हैं कि रुकने का नाम नहीं लेतीं। क्या महज मंत्र पढ़ने और सूक्ति लिखने से पर्यटन को बढ़ावा मिल जाएगा या इस दिशा में कोई ठोस बंदोबस्त भी किया जाएगा? आखिर इस बात की पड़ताल क्यों नहीं होती कि सुरक्षा में तकनीकी चूक कहां रह जाती है। क्या हम अपने मेहमानों को महज समाज के भरोसे छोड़ सकते हैं!
