ग्रेटर नोएडा इलाके में मंगलवार को कुछ अफ्रीकी मूल के विद्यार्थियों पर जिस तरह स्थानीय भीड़ ने हमला किया और बुरी तरह मारा-पीटा, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि आधुनिकता की चकाचौंध में पलते समाज में सोच-समझ के स्तर पर कितना विकास हो सका है। पहले वहां मादक पदार्थों की ज्यादा खुराक लेने से एक युवक की मौत की खबर आई। उसी के बाद एक जुलूस में शामिल लोगों ने एक मॉल में अफ्रीकी मूल के चार युवकों पर जानलेवा हमला कर दिया। फिर बुधवार को केन्या की एक युवती से मारपीट हुई। अब पुलिस इस पर सख्त कानूनी कार्रवाई कर रही है और केंद्र सरकार ने भी रिपोर्ट मांगी है। लेकिन यह समूचा मामला अपने आप में कई परतें लिए है। पहली नजर में यह एक युवक की मौत से उपजा क्षोभ दिखता है। सवाल है कि अगर किसी को इस बात की शंका थी भी तो क्या समाज और देश इस तरह भीड़ के न्याय के सिद्धांत पर आगे बढ़ेगा? दरअसल, हमारे समाज में एक तरह का मानसिक विभाजन हर वक्त काम करता रहता है। इसमें रंग, जाति और हैसियत के आधार पर बनी बेमानी धारणाएं और पूर्वाग्रह अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त होते रहते हैं।

इसी क्रम में अफ्रीकी मूल के लोगों के प्रति जो दुराग्रह पैदा हुए, उनसे कुछ लोग उन सबको मादक पदार्थों के तस्कर मानते और कुछ तो यहां तक सोचते हैं कि वे इंसानों को मार कर खा जाते हैं। सवाल है कि ऐसे प्रचार कौन करता है और लोगों के पास कितना विवेक है कि वे ऐसी बातों पर विश्वास कर लेते हैं! इसका नतीजा यह होता है कि अफ्रीकी मूल के लोगों को अक्सर स्थानीय लोगों की घृणा और हिंसा का शिकार होना पड़ता है। कुछ साल पहले आम आदमी पार्टी के नेता और तत्कालीन कानून मंत्री सोमनाथ भारती की मौजूदगी में दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन इलाके में सरेआम कुछ अफ्रीकी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया था। वहां भी यही अफवाह फैलाई गई थी कि ये लोग चोरी-छिपे मादक पदार्थ बेचते हैं। अव्वल तो मादक पदार्थों के धंधे में ज्यादातर स्थानीय लोग ही लिप्त होते हैं, लेकिन कुछ अश्वेत उसमें शामिल होते भी हैं तो उनके आधार पर वैसे दिखने वाले सारे लोगों को अपराधी मान लेना कहां की समझदारी है!

ऐसे पूर्वाग्रह केवल अफ्रीकी मूल के लोगों के खिलाफ नहीं पाए जाते। देश में दलितों पर हिंसा के ऐसे अनेक मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें वजह सिर्फ जाति होती है। देश के भीतर ही पूर्वोत्तर के लोगों को सिर्फ उनके अलग रंग-रूप की वजह से जिस तरह के दुर्व्यवहार झेलने पड़ते हैं, वह जगजाहिर है। यह अधिकारों के हनन का मामला तो है ही, लेकिन ज्यादा अफसोसनाक पहलू लोगों की समझ का स्तर है। आखिर किन वजहों से लोग अपने से अलग पहचान वालों से इस कदर नफरत करते हैं? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि रंग, नस्ल या जाति के आधार पर ही किसी को अपराधी मान लेने की मानसिकता समाज के सभ्य होने के रास्ते की बड़ी बाधा है। एक इंसान को उसी रूप में देखने की सलाहियत लोगों में पैदा नहीं हो सकी है, तो यह समाज और सत्ता की सामूहिक विफलता है। सरकार को न सिर्फ दूर देश से आकर यहां पढ़ाई कर रहे अफ्रीकी मूल के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, बल्कि ऐसी पहलकदमी भी होनी चाहिए जिससे लोगों की सोच में सकारात्मक बदलाव आ सके।