पीएनबी घोटाला उजागर होने के बाद से गिरफ्तारियों और छापों का सिलसिला जारी है। इस सब से जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे बैंकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता की पोल खोलते हैं। बैंकों में खासकर बड़े लेन-देन पर नजर रखने के लिए कई स्तरों की निगरानी व्यवस्था होती है, लिहाजा धोखाधड़ी की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। लेकिन धोखाधड़ी बस एक-बार या थोड़े-से वक्त नहीं हुई, बल्कि बहुत बार हुई और धोखाधड़ी का सिलसिला सालोंसाल चलता रहा। इसकी जद में केवल पंजाब नेशनल बैंक नहीं आया। तमाम दूसरे घोटालों की तरह इसमें भी अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत और रिश्वतखोरी सामने आई है। सीबीआइ ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया है उनसे हुई पूछताछ से पता चलता है कि नियम-कायदों को ताक पर रख एलओयू यानी लेटर आॅफ अंडरटेकिंग जारी किए गए। एलओयू एक प्रकार का गारंटीपत्र या साखपत्र होता है, जिसके आधार पर दूसरे बैंक एलओयू धारक को कर्ज दे देते हैं, इस बिना पर कि इसे चुकाए जाने की जवाबदेही एलओयू जारी करने वाले बैंक ने ले रखी है।
नीरव मोदी को पीएनबी की मुंबई स्थित एक शाखा ने एलओयू जारी किए थे और इसी आधार पर उसने पंजाब नेशनल बैंक के अलावा सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, देना, बैंक, बैंक आॅफ इंडिया, सिंडीकेट बैंक, ओरियंटल बैंक आॅफ कॉमर्स, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया, आइडीबीआइ बैंक, एक्सिस बैंक और इलाहाबाद बैंक की विदेश स्थित शाखाओं से कुल हजारों करोड़ रु. के कर्ज उठा लिये। यह पैसा न लौटने पर देर-सेबर भांडा फूटना ही था। पर सवाल है कि नियम-कायदों का उल्लंघन करते हुए ढेर सारे एलओयू कैसे जारी होते रहे? पकड़ में क्यों नहीं आया कि कुछ गलत हो रहा है? एलओयू को बैंक बुक में यानी बैंक के कोर बैंकिंग सिस्टम में दर्ज होना चाहिए था, पर कर्मचारियों ने ऐसा नहीं किया। एक ही कर्मचारी स्विफ्ट आॅपरेशन सिस्टम की जिम्मेदारी लगातार सात साल तक कैसे संभालता रहा?
एलओयू की राशि के आधार पर रिश्वत का फीसद तय था। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बैंक के आॅडिट में भी कुछ गलत नहीं पाया गया। बैंकों की आंतरिक निगरानी प्रणाली के खोखलेपन का इससे बड़ा प्रमाण और इससे बड़ा चिंताजनक पहलू और क्या होगा? घोटाले का आकार वही बताया जा रहा है जो एलओयू के जरिए नीरव मोदी ने विभिन्न बैंकों से कर्ज उठाए। पर नुकसान का दायरा धोखाधड़ी की भेंट चढ़ी रकम से बहुत ज्यादा है। पीएनबी के शेयरों के ढह जाने और दूसरे कई बैंकों के भी शेयरों के नीचे आने से निवेशकों को कुल हजारों करोड़ रु. की चपत लगी है। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआइसी को भी खासा झटका लगा है, जिसकी पीएनबी में करीब चौदह फीसद, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया और इलाहाबाद बैंक में करीब तेरह-तेरह फीसद और गीताजंलि जेम्स में करीब तीन फीसद हिस्सेदारी है।
मुखौटा कंपनियों का खेल खत्म हो जाने के दावे किए जा रहे थे। पर नीरव मोदी और साझेदार मेहुल चोकसी के ठिकानों पर रविवार को हुई छापेमारी में दोनों आरोपियों की दो सौ से ज्यादा मुखौटा कंपनियों के बारे में दस्तावेज जांच एजेंसियों के हाथ लगे हैं। और भी सबूत मिलने तथा और भी राज उजागर होने का सिलसिला अभी चलता रहेगा। पर सवाल है कि विश्वसनीयता को जो नुकसान पहुंचा है, क्या बैंक जल्दी उससे उबर पाएंगे? इस बीच निजी क्षेत्र के सिटी यूनियन बैंक में भी करोड़ों की धोखाधड़ी का मामला सामने आ गया। क्या ऐसी ही बैंकिंग व्यवस्था के बल पर भारत दुनिया के सामने अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा करेगा? यह घोटाला ऐसे वक्त सामने आया है जब सरकारी बैंकों पर एनपीए का बोझ रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। एनपीए का बोझ अब और बढ़ सकता है, जिसकी कीमत आम लोग ही चुकाएंगे।
