भारत भविष्य की आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना भले देखता हो, पर कटु सत्य यह है कि समावेशी विकास के मामले में आज भी कई विकासशील देशों से वह काफी पीछे है। अंतरराष्ट्रीय समूह आॅक्सफेम ने दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन से ठीक पहले जो समावेशी विकास सूचकांक जारी किया, उसमें चीन, ब्राजील और रूस तो हमसे आगे हैं ही, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसियों से भी पीछे हैं। समावेशी विकास के मामले में पाकिस्तान सैंतालीसवें नंबर पर है। चीन छब्बीसवें पायदान पर है। भारत बासठवें नंबर पर है। विकास का यह पैमाना लोगों के रहन-सहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरणीय स्थिति, आमद जैसे पहलुओं को शामिल कर तैयार किया जाता है। जाहिर है, आमजन के कल्याण की कसौटी पर भारत दुनिया के इकसठ विकासशील देशों से पीछे है। तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत दुनिया की आर्थिक महाशक्ति कैसे बनेगा! क्या सिर्फ उन एक फीसद लोगों के बल पर, जिनके पास पिछले साल सृजित हुई संपत्ति का तिहत्तर फीसद चला गया?
आॅक्सफेम ने इसी के साथ एक और रिपोर्ट जारी की, जो दुनिया में बढ़ती विषमता की तरफ संकेत करती है। भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट बेहद चौंकाने वाली है। इसमें बताया गया है कि भारत में अमीरों और गरीबों के बीच खाई जिस तेजी से बढ़ रही है वह बहुत ही चिंताजनक है। पिछले साल देश में सृजित संपत्ति का तिहत्तर फीसद मात्र एक फीसद लोगों के पास चला गया, जबकि उससे पहले के साल में यह आंकड़ा अट्ठावन फीसद का था। भारत में विषमता बढ़ने की रफ्तार विश्व के औसत से ज्यादा है, जबकि भारत का राज-काज एक ऐसे संविधान के तहत चलता है जिसके नीति निर्देशक तत्त्वों में गैर-बराबरी घटाना राज्य का कर्तव्य बताया गया है। कुल मिला कर देखें तो आज भारत के एक फीसद अमीरों के पास जितनी संपत्ति है वह चालू साल के केंद्र सरकार के बजट के बराबर है।
तो फिर ऐसे में गरीब कहां जाएगा? देश की बाकी बची सिर्फ सत्ताईस फीसद संपत्ति से सवा अरब लोगों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? कैसे देश में शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी की जाएंगी? उनके जन-हितैषी होने का दम भरने के बावजूद हालत यह है कि हर साल लाखों लोग इलाज के अभाव में मर जाते हैं। ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है जो गंभीर बीमारियों की सूरत में जान बचाने का खर्च नहीं उठा सकते। दूसरी ओर, मुट्ठी भर लोगों के लिए आलीशान पांच सितारा अस्पताल हैं। यह खाई ही, समावेशी विकास के मामले में भारत का ग्राफ ऊपर चढ़ने में सबसे बड़ी बाधा है। संयुक्त राष्ट्र की हर साल आने वाली मानव विकास रिपोर्ट भी इसी हकीकत की याद दिलाती है। समस्या यह है कि हमारे नीति नियामक इस सच्चाई से आंख चुराते रहे हैं।

