सरकारी बैंकों की सेहत सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने करीब एक लाख करोड़ रुपए का जो पैकेज घोषित किया है, वह एक जरूरी कदम था जो काफी पहले उठाया जाना चाहिए था। इस वक्त आधे से ज्यादा यानी ग्यारह सरकारी बैंकों की माली हालत खस्ता है। डूबते कर्ज और कुप्रबंधन की वजह से इन बैंकों की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि अगर वक्त रहते इन्हें मदद नहीं मिलती तो थोड़े समय बाद ये कारोबार करने की स्थिति में शायद ही रह पाते। इसलिए देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर सरकार एक लाख करोड़ रुपए की पूंजी बैंकिंग प्रणाली में डालेगी। इसमें से अस्सी हजार करोड़ रुपए बांड के जरिए जुटाए जाएंगे। इसके अलावा 8139 करोड़ रुपए सरकार अपने खजाने से देगी और बाकी दस हजार करोड़ रुपए का बंदोबस्त सरकार इन बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेच कर करेगी। यह मदद इसी वित्तवर्ष में दी जाएगी। दस बैंक ऐसे हैं जिन्हें साढ़े चार हजार करोड़ से ज्यादा की मदद देनी पड़ी है। सबसे खस्ता हालत आईडीबीआई बैंक की है। इसके निजीकरण तक पर विचार होने लगा था। अब इसे 10160 करोड़ रुपए की संजीवनी दी गई है। बैंक आॅफ इंडिया को 9232 करोड़ और एसबीआई को 8800 करोड़ रुपए दिए गए हैं।
बैंकों की कमर तोड़ने में सबसे बड़ी भूमिका उनकी गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) और बैंकिंग प्रणाली के कुप्रबंधन की रही है। पिछले तीन सालों में एनपीए जिस रफ्तार से बढ़ा है, वह भयावह है। अप्रैल 2015 में एनपीए पौने तीन लाख करोड़ रुपए था, जो दो साल के भीतर ही यानी जून 2017 में 7.33 लाख करोड़ तक पहुंच गया। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि अगले दो महीनों में यह नौ लाख करोड़ से ऊपर निकल जाएगा। हालात इतने विकट और चुनौतीपूर्ण हैं कि बैंकिंग व्यवस्था कब धराशायी हो जाए, कोई नहीं जानता। यह वह डूबी हुई रकम है जिसकी वसूली बैंकों के लिए एक दु:स्वप्न ही है। इसलिए बांड जारी करना ही सरकार को एकमात्र उपाय लगा जो फिलहाल बैंकों को इस संकट से उबार सकता है।
बैंकों का सरोकार बड़े और कॉरपोरेट ग्राहकों से कहीं ज्यादा आम जनता से है, या होना चाहिए।
आज भी लोगों को अपना पैसा बैंकों के पास ही सबसे ज्यादा सुरक्षित लगता है। यही साख और विश्वसनीयता बैंकों की सबसे बड़ी पूंजी भी है, जिसके भरोसे भारत में बैंक टिके हुए हैं। लेकिन जब से यह सुनने-पढ़ने में आ रहा है कि बड़े कर्जदार मौज काट रहे हैं और उनसे कर्ज वसूली बैंकों के बूते से बाहर की बात हो गई है तब से आम लोगों का बैंकों पर भरोसा कमजोर हुआ है। न जाने किस दिन बैंक दिवालिया हो जाएं और उनमें रखा पैसा डूब जाए! इसके अलावा बैंक अब ऐसे नियम-कायदे कानून थोपने लगे हैं जिनका बोझ अंतत: खाताधारकों पर ही पड़ रहा है और इससे बैंकों को होने वाली आमद उस घाटे की भरपाई करेगी जो एनपीए से हुआ है। पर यह तो वही बात हुई कि करे कोई भरे कोई! इसलिए बैंकों को ही ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि कर्जदार बच कर भाग न पाएं और आमजन का भरोसा भी बना रहे।

