महिलाओं के साथ बदसलूकी-बलात्कार जैसी घटनाओं को लेकर लगातार विरोध के स्वर, प्रशासन के मुस्तैदी संबंधी दावों और चेतना जगाने के प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल पा रहा है। ऐसी घटनाओं के आंकड़े बढ़ ही रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक कार से महिला और उसकी नाबालिग बच्ची को खींच कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म इसका ताजा उदाहरण है। पीड़िता अपने परिवार के साथ नोएडा से देर रात को चल कर अपने घर शाहजहांपुर जा रही थीं। बुलंदशहर कोतवाली देहात इलाके से जब वे गुजर रहे थे तो एक गांव के पास उनकी कार से किसी भारी चीज के टकराने की आवाज आई। उन्होंने गाड़ी रोक दी। इसी बीच करीब आधा दर्जन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। गाड़ी में सवार पुरुषों को पेड़ से बांधा और महिला व उसकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस घटना के बाद कोतवाली देहात के प्रभारी को लाइन हाजिर कर दिया गया। जब भी किसी घटना से सरकार और पुलिस की किरकिरी शुरू होती है, इसी तरह किसी अधिकारी को हटा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिलाओं के साथ ऐसे दुष्कर्म और गाड़ियों की चोरी, राहजनी, झपटमारी जैसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं और इन्हें रोक पाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। युवाओं में पनपती आपराधिक वृत्ति और महिलाओं के प्रति उनके संकीर्ण और दूषित नजरिए को लेकर अनेक अध्ययन आ चुके हैं। बहुत सारी जगहों पर सामूहिक बलात्कार की घटनाएं बदले की भावना के चलते भी होती हैं, खासकर नीची कही जाने वाली जातियों की महिलाओं के साथ ऊंची जातियों के लोगों का दुष्कर्म। मगर दिल्ली के विस्तार के साथ-साथ इससे सटे इलाकों में ऐसी घटनाएं बढ़ने के पीछे बड़ी वजह गुमराह और बेरोजगार युवाओं का संगठित अपराध की तरफ आकर्षित होना है। इन्हें कैसे सही रास्ते पर लाया जाए, इसका कोई उपाय सरकार के पास नहीं है।

दिल्ली के आसपास पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के एक बड़े हिस्से में रिहायशी कालोनियां बसाने, व्यावसायिक केंद्र खोलने, सड़कों और दूसरी परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है। जो परिवार खेती-बाड़ी पर निर्भर थे, उन्होंने मुआवजे की रकम से आलीशान मकान बनवा लिए, बड़ी-बड़ी गाड़ियां खरीद लीं और महानगर की रंगीनी में रंग गए। बाजार ने उनकी ख्वाहिशें बढ़ा दीं। ऐशो-आराम की हर चीज उन्हें भाने लगी। रईसों के शौक उन्हें लुभाने लगे। संचार माध्यमों से उन्हें उन्मुक्त होने का नुस्खा हाथ लगा। पर आजीविका का साधन न होने के कारण धीरे-धीरे उन परिवारों के युवाओं में कुंठा घर करती गई और वे आसान तरीके से पैसे कमाने के रास्ते तलाशने लगे। अपराध को उन्होंने जायज जरिया मान लिया।

राहजनी, अपनी कुंठा मिटाने के लिए महिलाओं से बदसलूकी, चोरी आदि प्रवृत्तियां उनमें तेजी से पनपी हैं। जब किसी समाज का पारंपरिक पेशा छीनता है, उसका सामुदायिक जीवन नष्ट-भ्रष्ट होता है तो उसके युवाओं में ऐसी ही प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। विकास के नाम पर जो सरकारें किसानों से जमीनें ले रही हैं, मगर उनके समुचित पुनर्वास पर ध्यान नहीं दे रही हैं, उन्हें इस मसले पर सोचने की जरूरत है। अपराध को उचित मान लेने वालों को कैसे सही रास्ते पर लाया जा सकता है, इसके लिए उपाय जुटाने की जरूरत है। यह सिर्फ किसी पुलिस अधिकारी को लाइन हाजिर कर देने से काबू में नहीं आने वाला।