भारत डोगरा व जगमोहन सिंह

विश्व के अनेक महान व्यक्तियों के बारे में कहा गया है कि उनकी प्रतिभाओं और प्रतिबद्धताओं को निखारने में उनके परिवार द्वारा दिए गए जीवन मूल्यों व प्रेरणा स्रोतों की अति महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। शहीद भगत सिंह के बचपन में भी यही स्थिति बहुत असरदार ढंग से नजर आती है। भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह नए विचारों को अपनाने में बहुत हिम्मत अपनाने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने आर्य समाज को (उस समय के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में) एक भारतीय समाज में सुधार लाने वाली और उसमें जागृति लाने वाली शक्ति के रूप में अपनाया और उसके संकीर्ण तत्त्वों को पीछे छोड़ते हुए उसकी सुधारवादी और सामाजिक जागृति वाली प्रवृत्तियों को प्रतिष्ठित किया। हम कभी तो उन्हें स्वयं असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए जाते हुए देखते हैं, तो कभी भावी पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के लिए तैयार करते हुए। उनके तीनों बेटे स्वतंत्रता सेनानी बने। अपने दो पोतों जगत सिंह और भगत सिंह के यज्ञोपवीत संस्कार के समय उन्होंने कहा ‘मैं इन्हें देश की आजादी को वक्फ करता हूं’। अर्जुन सिंह की पत्नी जय कौर ने विभिन्न सामाजिक सरोकारों में सहयोग की भूमिका खूब निभाई और बहुत से जरूरतमंद गांववासियों के लिए चिकित्सक भी बनीं। अर्जुन सिंह और जय कौर के सबसे बड़े बेटे का नाम था किशन सिंह। अकाल हो या बाढ़, विभिन्न आपदाओं में सेवा व राहत कार्य का आयोजन उन्होंने कम उम्र में ही किया। फिर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और देश के आजाद होने तक इससे जुड़े रहे। कई बार जेल गए, अत्याचार सहे, कैदियों की हालत सुधारने के लिए संघर्ष किया। आजादी की लड़ाई में गर्म सोच व सांप्रदायिकता विरोधी सोच को आगे बढ़ाने में अधिक ध्यान दिया।

अपनी योग्यता के आधार पर थोड़े ही प्रयास से आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर ली थी, पर शीघ्र ही आजादी के संघर्ष के लिए सब कुछ गंवाने को तैयार हो गए। परिवार को बहुत कष्ट देखने पड़े। बेटे भगत सिंह और उनके साथियों के मुकदमों के खर्च और उससे जुड़ी भाग-दौड़ के लिए घर के दरवाजे तक बेचने की नौबत आ गई। परिवार की अपनी आर्थिक कठिनाइयां कितनी भी रही हों, पर इसके बावजूद अपनी व्यापक जिम्मेदारी को निभाते हुए इस परिवार ने 22 अनाथ बच्चों का भरण-पोषण किया, उन्हें घर-परिवार का माहौल व प्यार दिया। इन सभी बच्चों ने बाद में आजादी की लड़ाई में भरपूर योगदान दिया। साल 1898 के आसपास उनका विवाह विद्यावती से हुआ। स्वतंत्रता सेनानी करतार सिंह एक बार परिवार में आए तो विद्यावती को इन्होंने कहा-बहन जी आप परात भरकर भोजन खिलाती हैं व परात भरकर ही देश की आजादी को नए वीर समर्पित करती हो। विद्यावती ने स्वतंत्रता सेनानियों के इस परिवार की बड़ी बहू की हर जिम्मेदारी को बहुत साहस और गरिमा से निभाया। अपने इस साहस के बल पर उन्होंने असहनीय कष्टों को कर्तव्य पथ से विचलित हुए बिना सहा।
भगत सिंह की फांसी के आसपास का समय सबसे गहरे दु:ख का तो था ही, साथ ही इस समय परिवार की आर्थिक स्थिति भी बुरी तरह टूट चुकी थी। फांसी से कुछ समय पहले भगत सिंह ने अपनी मां से कहा था, ‘बेबे जी, (फांसी की खबर मिलने पर) रोना मत! लोग क्या कहेंगे कि भगत सिंह की मां रो रही है’। फांसी के बाद मां की क्या स्थिति थी, इसके बारे में विद्यावती ने बाद में बताया – ‘भीतर के आंसुओं का समुद्र उमड़ता, पर आंखों तक आते-आते मेरी बुद्धि उसे रोक देती। भगत के कहे शब्द मेरे कानों में गंूजने लगते। मैं भीतर ही भीतर घोलती रही उन आंसुओं को’। कुछ समय बाद उनके दो अन्य बेटों कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह को भी अंग्रेज सरकार ने जेल में डाल दिया (कुछ वर्षों बाद विद्यावती की बेटी अमर कौर को भी जेल में डाल दिया गया) तो उन्होंने लाहौर की एक विशाल सभा में एलान किया, ‘मैं मिट जाऊंगी पर झुकूंगी नहीं। मैं ब्रिटिश-साम्राज्य को नई चुनौती देती हूं और दूसरे दो बेटे भी देश-सेवा के लिए पेश करती हूं’। तो ऐसी थीं भगत सिंह की मां। ऐसे माता-पिता की छत्रछाया में ही इतना बहादुर नौजवान तैयार हो सकता था। किंतु भगत सिंह को आजादी की लड़ाई के लिए अपने माता-पिता से भी अधिक प्रेरणा तो अपने चाचा अजीत सिंह से मिली। अजीत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे साहसी और योग्य सेनानी थे जिनकी महानता से अधिकांश इतिहासकार न्याय नहीं कर सके हैं। कारण यह है कि बहुत कम उम्र में ही अपनी प्रखरता और लोकप्रियता के कारण वे अंग्रेजों की आंखों में इतना खटकने लगे थे कि मात्र 30 वर्ष की आयु में ही उन्हें देश से बाहर जाकर यूरोप में अपना कार्य जारी रखना पड़ा। तब से देश की आजादी तक लगभग 37 वर्ष जहां भी रहे आजादी की धुन में ही लगे रहे। जब वे घर से गए तो भगत सिंह मात्र 3 वर्ष के ही थे। दोनों में प्यार बहुत था। भगत सिंह बड़े हुए तो निरंतर अपने चाचा के कार्यों से प्रेरणा लेते रहे।

भारत में जब तक अजीत सिंह रहे तब तक गर्मपंथी कांग्रेसी नेताओं से संपर्क रख कर व अंबा प्रसाद व लाला हरदयाल जैसे सहयोगियों से मिलकर, भारत माता सोसाईटी के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध निरंतर सक्रियता दिखाते रहे। भारत माता बुक एजंसी के माध्यम से बहुत सा देशभक्ति का साहित्य तैयार किया गया व वितरित किया गया। पंजाब में अन्यायपूर्ण करों के विरुद्ध किसानों का आंदोलन उनके नेतृत्व में सफल रहा। लोकमान्य तिलक सरदार अजीत सिंह से इतने प्रभावित थे कि उनके सिर पर ताज रखते हुए उन्होंने कहा था, ‘ये इस योग्य हैं कि इन्हें स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रपति बनाया जाए’। सरदार अजीत सिंह की पत्नी हरनाम कौर ने जीवन के लगभग 37 वर्ष उनके इंतजार में बिताए। इस दौरान परिवार के सब संघर्षों को बहादुरी से सहते हुए उन्होंने गांववासियों की चिकित्सा सेवा करना भी जारी रखा। परिवार को वस्त्रों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखा भी खूब चलाया। अर्जुन सिंह के सबसे छोटे बेटे व भगत सिंह के छोटे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह ने सार्वजनिक जीवन का आरंभ अकाल राहत कार्य और अनाथालय के योग्य संचालन से किया। फिर वे भी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और जेल गए। वहां उन्होंने जेल में अत्याचारों का भी विरोध किया। भारत माता सोसाइटी के प्रकाशनों की जिम्मेदारी उन्होंने उठाई व इस कारण उन्हें सख्त सजा देकर जेल भेजा गया। जेल यात्रा के दौरान वे गंभीर रूप से बीमार होने पर रिहा किए गए व 23 वर्ष की जवानी में ही उन्होंने भी शहादत प्राप्त की। बाद में इसी उम्र में उनके भतीजे भगत सिंह ने भी शहादत प्राप्त की। उनकी पत्नी हुकम कौर की अंत तक परिवार के सब संघर्षों में भागीदारी रही और कठोर परिश्रम कर उसमें अपना योगदान वे देती रहीं। इस परिवार का विशेष योगदान 1907 के आजादी के आंदोलन के जबरदस्त उभार के समय देखा गया जब अपने साथियों लाला लाजपत राय, अंबा प्रसाद, लालचंद मुलक और पिंडी दास जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के सहयोग से किसानों को व्यापक स्तर से जोड़ते हुए इतना व्यापक जनभागीदारी का आंदोलन खड़ा किया गया कि वायसराय को अपने जनविरोधी आदेश वापस लेने पड़े।
तो यह वह परिवार था जिसमें भगत सिंह ने किशन सिंह और विद्यावती के दूसरे पुत्र के रूप में 28 सितंबर 1907 को जन्म लिया। इन्हीं दिनों पिता किशन सिंह और छोटे चाचा स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए तथा इन्हीं दिनों अजीत सिंह के बर्मा के मांडले किले से रिहा होने के निर्णय की पहली सूचना मिली। जिस बच्चे के जन्म पर इतनी सारी अच्छी बातें एक साथ हो जाएं उसे बहुत भाग्य वाला ही माना जाएगा। अत: उनके दादा ने बालक का नाम रखा भगत सिंह।

इस तरह स्पष्ट है कि भगत सिंह को देश-सेवा की भावना अपने परिवार से हर कदम पर, हर सदस्य से मिली। दादा जी, पिता, बड़े चाचा, छोटे चाचा, सभी स्वतंत्रता सेनानी थे। मां, दोनों चाचियों, की भी पूर्ण हिस्सेदारी इस संघर्ष में थी। देश-सेवा का संदेश ही उन्हें नहीं मिला, पिता और दोनों चाचाओं ने आजादी की लड़ाई में अनेक कष्ट और यातनाएं झेलकर उसके लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की प्रेरणा भी उत्पन्न की। जिस परिवार में भगत सिंह का बचपन बीता, उसमें पंजाब की संस्कृति की विभिन्न समृद्ध व उन्नत धाराओं का बहुत सुंदर समावेश सतत प्रयास व तर्कशीलता के आधार पर किया गया था। दादा अर्जुन सिंह जहां एक ओर गुरु ग्रंथ साहब के विद्वान टीकाकार थे और अनुचित, तर्कविहीन व्याख्या को चुनौती भी देते थे वहां दूसरी ओर आर्यसमाज के उन पक्षों को उन्होंने जिया जो तत्कालीन समाज के सबसे महत्त्वपूर्ण सुधारों से जुड़े थे जैसे कि छुआछूत का विरोध।

किसी व्यक्ति की मुक्ति के स्थान पर उन्होंने लोगों से मिलकर उनके दुख-दर्द को दूर करने को महत्त्व दिया। अपनी बड़ी बहू का नाम विद्यावती इसलिए रखा क्योंकि वे महिलाओं की शिक्षा के प्रबल हिमायती थे और इस विचार को अपने परिवार में ही प्रतिष्ठित करना चाहते थे। इसकी अभिव्यक्ति हमें आगे इस तथ्य से मिलती है कि उनकी मंझली बहू हरनाम कौर ने गांव की अनेक महिलाओं को शिक्षित करने की जिम्मेदारी संभाली। हरनाम कौर स्वयं कसूर के ऐसे परिवार से आई थीं जो सूफीवाद व विशेषकर बुल्लेशाह के विचारों से प्रभावित था। यह भी कहा जाता है कि अजीत सिंह से हरनाम कौर का प्रथम मिलन भी तब हुआ जब वे बुल्लेशाह के उर्स में काफियां सुनने के लिए उर्स में जाने की इजाजत लेने अपने धर्म-पिता के पास आई थीं और वहां सरदार अजीत सिंह आए हुए थे। बाद में उनके हाथ मिलाकर उनका विवाह उनके धर्म-पिता ने सूफी संदेश के साथ किया था। इस तरह की विभिन्न समृद्ध परंपराओं, आपसी सहिष्णुता व तर्कशीलता का अद्वितीय मिलन उस परिवार में था जिसमें भगत सिंह ने अपने आरंभिक संस्कार ग्रहण किए।