उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर पैसेंजर ट्रेन की टक्कर से वैन में सवार आठ बच्चों की मौत और दस का घायल होना चौतरफा लापरवाही का नतीजा है। लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे हादसे को जिस तरह देखा जाता है, उसमें आमतौर पर किसी की आखिरी जवाबदेही तय नहीं हो पाती। यह सही है कि रेलवे क्रॉसिंगों पर ज्यादातर हादसे वाहनचालकों की लापरवाही और मनमानी के चलते होते हैं। कैयरमऊ रेलवे क्रॉसिंग पर हुई इस दुर्घटना की प्राथमिक वजह के तौर पर यही खबर आई है कि स्कूली बच्चों को ले जाते वाहन के ड्राइवर ने अपने कान में मोबाइल का ईयरफोन लगा रखा था और इसी वजह से न वह आ रही ट्रेन पर ध्यान दे सका, न गेट मित्र और बच्चों की आवाज सुन सका।

जाहिर है, इस दुखद घटना के लिए ड्राइवर की लापरवाही जिम्मेदार है। लेकिन दूसरा पहलू यह है कि उस रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन के गुजरने के वक्त वाहनों और लोगों की आवाजाही को रोकने के लिए फाटक नहीं था। वहां रेलवे की ओर से ठेके पर फौरी तौर पर रखा गया एक गेट-मित्र जरूर मौजूद था। लेकिन अपने देश में सड़कों पर लापरवाही से वाहन चलाने की जो आम प्रवृत्ति है, उसमें उस गेट-मित्र का आवाज लगाना बेकार गया। लेकिन अगर फाटक और उसे नियंत्रित करने के लिए रेलवे की ओर से चौकस व्यवस्था होती तो शायद यह हादसा न होता।

रेल सुरक्षा के मसले पर एक उच्चस्तरीय सुरक्षा समिति ने सालों पहले फाटकों पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए शीघ्र उपरिपुल और पार-पथ बनाने की सिफारिश की थी। पिछली कई सरकारों के समय से रेल मंत्रालय सिर्फ इस बात की घोषणा भर करता रहा है कि मानवरहित रेल फाटकों को खत्म कर दिया जाएगा। मौजूदा रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने बजट पेश करने के दौरान कहा था कि चालीस फीसद रेल हादसे और अड़सठ फीसद मौतें इन्हीं रेलवे क्रॉसिंग पर होती हैं। लेकिन देश भर में बुलेट ट्रेन और इस जैसी दूसरी तीव्र गति वाली खर्चीली ट्रेनें चलाने के लिए तमाम इंतजाम में लगी सरकार को उन पर अरबों रुपए बहाने में कोई हिचक नहीं हो रही, वहीं लगातार हादसों की सबसे बड़ी वजहों में एक मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग की समस्या से निपटना उसे जरूरी नहीं लगता।

फाटकों पर चौकीदारों के अलावा रेलवे में एक लाख से ज्यादा पद खाली हैं, मगर उन्हें भरने की बात आते ही धन की कमी का रोना रोया जाता है। अब इस हादसे के बाद फिर एक रिवायत की तरह राज्य सरकार की ओर से मुआवजे और रेलवे की ओर से जांच की घोषणा हो जाएगी और फिर सब कुछ पूर्ववत चलता रहेगा। बहरहाल, भदोही में हुए हादसे ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस ओर भी खींचा है कि आधुनिक संसाधन आसानी से मुहैया हैं तो मनोरंजन किस हद तक और किस कीमत पर! ईयर फोन लगा कर मनोरंजन में गुम हो जाने की आदत सड़कों और रेल पटरियों पर दर्जनों लोगों की जान ले चुकी है। क्या वाहन चलाने के दौरान इस आदत पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं है?