सीवर में सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब भी इन मौतों के लिए सीधी जवाबदेही तय करने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन सकी है। अब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने कहा है कि ऐसे मामलों में राज्य सरकारें संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करें और कोई ‘हादसा’ होने पर इन पर सख्त कार्रवाई करें। आयोग का यह कहना बिल्कुल वाजिब है कि राज्य सरकारें पहले सुनिश्चित करें कि सफाई के दौरान किसी कर्मचारी की मौत न हो। यों गहरे सीवरों में उतर कर सफाई के दौरान सुरक्षा-उपायों का इस्तेमाल पहले भी अनिवार्य रहा है, इससे संबंधित अदालती आदेश और बाकायदा कानून भी हैं, मगर शायद ही कहीं इन पर अमल किया जाता है।
हाल के दिनों में दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस काम को करते हुए एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, तो इस पर तीखे सवाल उठे। उसके बाद दिल्ली सरकार की नींद खुली और उसने सीवर में किसी भी व्यक्ति को उतारने को अपराध घोषित कर दिया। नए नियमों के मुताबिक अब अगर सफाई के लिए किसी मजदूर को सीवर में उतारा गया तो इंजीनियर या ठेकेदार पर लापरवाही के बजाय गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाएगा। दरअसल, किन्हीं हालात में सीवर की गैस की चपेट में आए मजदूर की मौत दम घुटने से हो जाती है तो उसे सामान्य लापरवाही का मामला मान लिया जाता रहा है। जबकि सीवर में जानलेवा गैसों के खतरे के बावजूद किसी को उसमें उतारना एक तरह से मौत के मुंह में भेजने जैसा है। सफाई का ठेका लेने वाले लोग कम से कम खर्च में और कम से कम मजदूरी देकर काम निपटा देना चाहते हैं। इसी वजह से वे सीवर में उतरने वाले की जिंदगी की परवाह नहीं करते। सीवर सफाई के वैकल्पिक उपाय किए जा सकते हैं, जैसा कि दुनिया के बहुत सारे देशों में है। सीवर की सफाई करने वालों की जान की फिक्र क्या इसलिए नहीं की जाती कि वे समाज के सबसेकमजोर और हाशिये के तबके से आते हैं?
सफाई कर्मचारी आंदोलन नामक संगठन के अध्ययन के मुताबिक पिछले पांच सालों के दौरान देश भर में लगभग पंद्रह सौ लोगों की जान सीवर में दम घुटने की वजह से जा चुकी है। आखिर क्या वजह है कि हर साल सैकड़ों लोग इस तरह नाहक मारे जाते हैं, लेकिन सीवर की सफाई के तौर-तरीकों में बदलाव की पहल नहीं की जाती। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि एक ओर जहां विज्ञान और तकनीकी की दुनिया में बड़ी उपलब्धियों के साथ हमारा देश दुनिया के विकसित देशों के बरक्स होड़ में है, वहीं जहरीली गैसों से भरे सीवर को साफ करने के लिए तकनीकी का सहारा नहीं लिया जाता। बहुमंजिला इमारतों के निर्माण से लेकर गहरे नाले खोदने तक के लिए अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें इंसानों की जरूरत लगभग समेट दी गई है, वहीं जानलेवा गैसों से भरे सीवर की सफाई के लिए आज भी उसमें बिना सुरक्षात्मक उपायों के लाचार मजदूरों को उतार दिया जाता है। संवेदनहीनता का यह निर्मम सिलसिला जल्द से जल्द बंद होना चाहिए।

