नीतू सिंह

सवा अरब भारतीय एक से अधिक भाषाएं बोलते हैं। ऐसे में हमारे भीतर द्विभाषी होने की क्षमता प्राकृतिक रूप से ही आ जाती है। आपको यह जानकर भी कोई हैरानी नहीं होगी कि 87 मिलियन भारतीय त्रिभाषी होते हैं, यानि कि वे तीन भाषाएं बोल सकते हैं। सांस्कृतिक विविधता और माहौल इसमें अहम भूमिका निभाता है। चूंकि अंग्रेजी एक वैश्विक भाषा है, ऐसे में हम यह महसूस कर रहे हैं हमारी मूल भाषाओं को लेकर धीरे-धीरे लोगों का रुझान कम हो रहा है। ऐसे में हम भले अपने बच्चे की अंग्रेजी बोलने की क्षमता को और मांजने में लगे हुए हों, मगर बाल विशेषज्ञ यह मानते हैं कि बहुभाषी होने से बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास में काफी मदद मिलती है। पारस ब्लिश पंचकूला के सीनियर गायनेकॉलजिस्ट डॉक्टर राजेंद्र पी. शेट्टी कहते हैं, ‘जो बच्चे अपनी मातृभाषा के अलावा एक और भाषा पर पकड़ रखते हैं उनमें एक साथ एक से अधिक कार्य पूरा करने की क्षमता अधिक होती है। वे प्राकृतिक रूप से अधिक अभिव्यक्तिशील होते हैं और ऐसे में उनमें संज्ञानात्मक लचिलापन भी ज्यादा होती है। कई तरह की भाषाओं का ज्ञान होने से क्लास में भी उनकी ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। यही वजह है कि द्विभाषी अथवा बहुभाषी बच्चों की पढ़ने की क्षमता अच्छी होती है। यह भी देखा गया है कि एक से अधिक भाषा बोलने वाले लोगों में संवेदनशीलता अधिक होती है’।

यह कैसे आपके बच्चे के पालन-पोषण को प्रभावित करता है? क्या बहुभाषी होना किसी सामाजिक चुनौती से संबंध रखता है? अध्ययन बताते हैं कि ऐसा है। अमेरिका में जन्मे और पले-बढ़े भारतीय अक्सर अपने बच्चों को अपनी मूल भाषा सिखाने से झिझकते हैं। उन्हें यह डर लगता है कि शायद ऐसा करने से वे ‘कम अमेरिकन’ लगने लगेंगे। ऐसा इसलिए ंकि हर भाषा के साथ उसकी खास टोन जुड़ी होती है। इससे सामाजिक भेदभाव का अहसास जन्म लेता है। लेकिन बहुभाषी होने के तमाम फायदे हैं। हालांकि बहुत सारे लोगों को इस बात से संबंधित तमाम संदेह भी रहते हैं।

इस संदर्भ में डॉ. राजेंद्र शेट्टी कहते हैं, ‘ऐसा पाया गया है कि द्विभाषी ऑटिस्टिक बच्चे एक भाषा जानने वाले बच्चों की तुलना में एक साथ एक से अधिक काम को पूरा करने में ज्यादा सक्षम होते हैं। इसका कारण यह है कि विभिन्न भाषाओं को ग्रहण करते हुए उनके दिमाग के टिश्यू की सघनता बेहतर हो जाती है और दिमाग बेहतर संज्ञानात्मक प्रतिक्रिया देता है। अभिभावक को बहुत सारी भाषाओं से बच्चों को भ्रमित करने की जरूरत बिल्कुल नहीं होती है। हमारे बच्चे हमारी समझ की तुलना में अधिक तेज होते हैं। आप जितनी जल्दी नई भाषा से उन्हें अवगत कराएंगे, उनमें उसे ग्रहण करने की क्षमता उतनी बेहतर होगी।

बहुभाषी बच्चे अधिक रचनात्मक भी होते हैं। इतना ही नहीं बहुभाषी बच्चों में डिमेंशिया होने का खतरा भी 5 साल देर से आता है’। भारतीय होने के नाते हमारे भीतर बहुभाषी होने का गुण प्राकृतिक रूप से ही आ जाता है। लेकिन बहुभाषी होने से बच्चों को बहुत सारे लाभ होते हैं, यह बात वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुकी है। संज्ञानात्मक संयोजन की जरूरत के कारण, बहुभाषी बच्चों का मानसिक आधार बेहतर होता है। एक स्वस्थ दिमाग बुढ़ापे में होने वाली समस्याओं जैसे कि डिमेंशिया और याददाश्त की कमजोरी आदि की चपेट में भी आसानी से नहीं आता है।