इस बार मानसून की पहली बारिश में ही विभिन्न शहरों में भारी जलभराव और लोगों के डूब कर मरने की खबरें आ गई। मुंबई में दो लोग मर गए। अभी अगले तीन दिनों तक भारी बारिश के अनुमान हैं, इसके लिए संबंधित विभागों को सतर्क रहने की चेतावनी दे दी गई है।

यानी अभी और नुकसान की आशंका है। यह कोई पहली बरसात नहीं है, जब शहरों का जीवन इस तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। पिछले कई सालों से ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, मगर इसके स्थायी समाधान की तरफ कोई कदम बढ़ाया जाता नहीं दिखता। मुंबई में हर बरसात में लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता है, रेल सेवाएं बाधित हो जाती हैं, मकानों के धंसने से कई लोगों की जान चली जाती है।

मगर बरसात बीतते ही जैसे इस समस्या को भुला दिया जाता है। लंबे समय से यह बात रेखांकित की जा रही है कि शहरों के विस्तार के अनुसार जलनिकासी की समुचित व्यवस्था न होने की वजह से बरसात में ऐसी मुश्किलें पेश आती हैं। बढ़ती आबादी के अनुसार जलनिकासी आदि की व्यवस्था होना बहुत जरूरी है।

मगर स्थिति यह है कि जो मुहल्ले पुराने हो गए हैं, वहां आबादी सघन होती गई है और जल निकासी की व्यवस्था पुरानी ही बनी हुई है। इस वजह से बरसात का पानी निकलने में काफी वक्त लग जाता है। फिर मुंबई आदि महानगरों में जलनिकासी के उन स्रोतों पर अवैध कब्जा हो चुका है, उनमें बस्तियां बस चुकी हैं, जिनके जरिए शहरों का पानी बह कर समुद्र या नदियों तक पहुंचता था।

मुंबई की मीठी नदी इसका बड़ा उदाहरण है। शहरों के बीच से निकलने वाली ऐसी नदियों और जल निकासी के मकसद से बने नालों के भीतर तक अवैध बस्तियां बस गई हैं। उनसे जल निकासी बाधित हो चुकी है। शहरों के तालाबों और जल संग्रहण के प्राकृतिक स्रोतों पर भी इसी तरह कब्जा कर लिया गया है। इस वजह से भी मुहल्लों में लंबे समय तक जल भराव बना रहता है।

फिर महानगरों में अनियोजित भवन निर्माण भी इसका बड़ा कारण है। अनेक जगहों पर अवैध रूप से बस्तियां तो बस जाती हैं, मगर उनमें बरसात के पानी के निकास की व्यवस्था नहीं हो पाती। कई जगहों पर लोग जल निकासी के लिए सीवर के मैनहोल खोल देते हैं, जिसके चलते भी हादसे होते हैं। हर साल इस तरह खोली गई भूमिगत नालियों में बह कर लोग दम तोड़ देते हैं।

शहरों में जलजमाव का बड़ा कारण नगर निगमों की लापरवाही है। सड़कों के किनारे जल निकासी के लिए बनी जालियों को तोड़ दिया जाता है, जिसकी वजह से नालियों में कचरा भरता रहता है। कायदे से बरसात शुरू होने से पहले नगर निगम को उन नालियों की सफाई करनी चाहिए, ताकि बरसात का पानी सुगमता से निकल सके।

मगर उसकी नींद तब खुलती है, जब बरसात हो जाती है और जगह-जगह जलभराव शुरू हो जाता है। तब वे किसी तरह नालियों के मुहाने खोलने का प्रयास करते हैं, मगर वह कारगर साबित नहीं हो पाता, क्योंकि नालियों में गाद भरी रहती है। इस तरह शहरों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति के पीछे पूरे तंत्र की लापरवाही है। जब तक इससे निपटने के लिए समग्र रूप से प्रयास नहीं होगा, यह समस्या हर साल बढ़ती ही जाएगी।