कई अमेरिकी सीनेटरों का उचित ही यह मानना है कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तब तक नहीं जीत सकता, जब तक पाकिस्तान अफगानिस्तान में कट्टरपंथी समूहों को समर्थन देना बंद नहीं कर देता। सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी में अफगानिस्तान पर कांग्रेस की सुनवाई के दौरान इन सीनेटरों ने कहा कि अफगानिस्तान में सक्रिय चरमपंथी समूहों को पाकिस्तान का समर्थन समाप्त होना चाहिए, भले यह समर्थन जान-बूझ कर दिया जा रहा हो या परोक्ष रूप से। क्या इस तरह की प्रतिक्रियाएं अमेरिका की कमान ट्रंप के हाथ में आने की देन हैं? बेशक ट्रंप ने आतंकवाद पर बहुत सख्त रुख दिखाया है। पाकिस्तान में जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद की नजरबंदी को ट्रंप के असर के तौर पर देखा जा रहा है। यही नहीं, जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आतंकवादी घोषित कराने की भारत की पहल अब अमेरिका ने अपने हाथ में ले ली है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान पर सीनेटरों का गुस्सा पहली बार नहीं फूटा है। इस तरह की बैठकें बहुत बार हुई हैं और उनमें पाकिस्तान की आलोचना भी। ऐसे मौकों पर पाकिस्तान के रवैए को लेकर निराशा जाहिर करने के साथ ही उसे सामरिक और वित्तीय सहायता बंद करने से लेकर उसे आतंकवाद को प्रोत्साहित करने वाला देश घोषित करने तक की मांग उठती रही है। पर ये सारी चर्चाएं किसी निर्णायक मोड़ पर क्यों नहीं पहुंच पाती हैं?
दरअसल, पाकिस्तान को लेकर अमेरिका हमेशा एक गहरी दुविधा में रहा है। एक तरफ आतंकवाद के मामले में अमेरिका को लगता है कि पाकिस्तान का रवैया संदिग्ध है, वह हक्कानी नेटवर्क और तालिबान-पाकिस्तान और अन्य आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने में हमेशा अनिच्छुक रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका को यह भी लगता है कि अफगानिस्तान में तालिबान से निपटने और वहां स्थायी शांति कायम करने के लिए पाकिस्तान का सहयोग जरूरी है। गौरतलब है कि सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी की इसी बैठक के दौरान अफगानिस्तान में नाटो बलों व अमेरिका के कमांडर जनरल जॉन निकोल्सन ने जहां यह कहा कि युद्ध के मैदान में उस वक्त जीतना बहुत मुश्किल हो जाता है जब आपके दुश्मन को बाहरी सहायता या पनाहगाह मिलती है, वहीं उन्होंने यह राय भी पेश की कि हमें पाकिस्तान के साथ मिल कर काम करना जारी रखना होगा। दरअसल, पाकिस्तान के मामले में सीनेटरों और अमेरिकी प्रशासन की सोच में हमेशा फांक रही है। फिर, इस्लामी दुनिया और दक्षिण एशिया के मद््देनजर भी अमेरिका को पाकिस्तान को अपने प्रभाव में रखने की उपयोगिता दिखती है।
यही कारण है कि पाकिस्तान को लेकर अमेरिका कभी दो टूक निर्णय नहीं ले पाता। अलबत्ता पाकिस्तान को फटकार लगाने, आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए उस पर दबाव डालने आदि का क्रम चलता रहता है। यही नहीं, पिछले कुछ बरसों में पाकिस्तान को अमेरिका की सामरिक और वित्तीय, दोनों तरह की मदद में कमी आई है। ये कटौतियां पाकिस्तान को चुभी होंगी। पर जाहिर है, यह काफी नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई के लिए पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव तभी डाला जा सकेगा जब अमेरिका अपनी पुरानी दुविधा से बाहर आए और पाकिस्तान को दी जा रही सहायता में कटौती तक सीमित न रहे बल्कि अपने अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का भी इस्तेमाल करे।
