धर्म और आस्था आम लोगों की जिंदगी के बेहद संवेदनशील विषय रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति इसमें सुधार की अपेक्षा से कुछ कह रहा हो तो ऐसा किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाए बिना भी किया जा सकता है। इसके लिए समाज की संरचना और उसमें धारणाओं के निर्माण की जड़ों को समझने की जरूरत होती है। लेकिन अगर आवेश में आकर या फिर महज अपनी राजनीति चमकाने के लिए धर्म को लक्ष्य करके नाहक ही कोई टिप्पणी की जाती है तो इससे विवाद और टकराव पैदा होने के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।

धर्म का अपमान करके राजनीति करने की कोशिश

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने जिस तरह कुछ बीमारियों को हटाने की बात कहने के साथ-साथ सनातन के बारे में अवांछित टिप्पणी की, उससे साफ है कि वे समाज की जिस समस्या को इंगित करना चाह रहे हैं, उसका हल निकालने को लेकर वे राजनीतिक रूप से परिपक्व समझ शायद नहीं रखते। यही वजह है कि उनके बयान को यह कहते हुए कठघरे में खड़ा किया जा रहा है किसी धर्म का अपमान करके वे किस तरह की राजनीति करना चाह रहे हैं!

वैचारिक असहमतियां हर युग और काल में रही हैं

किसी खास विचारधारा का समर्थक होने के नाते अन्य परंपराओं को लेकर मतभिन्नता कोई नई बात नहीं है। प्राचीन काल से सभी धर्म और मतों के बीच वैचारिक असहमतियां और बहसें रही हैं। परंपरा में घुस आई विकृतियों को दूर करने के लिए समय-समय पर समाज सुधारकों ने आवाज उठाई और कई ऐसी प्रथाओं को दूर किया गया, जिन्हें अमानवीय या भेदभावमूलक माना जाता है। यही नहीं, स्त्रियों या अन्य सामाजिक वर्गों के खिलाफ भेदभाव, अत्याचार या शोषण से जुड़ी कई परंपराओं को बाकायदा कानून बना कर खत्म किया गया। दरअसल, किसी धर्म के दायरे में कोई विकृत परंपरा विकसित होती है, तो उसमें जिस तरह वक्त लगता है, उसी तरह उसकी पहचान करने के बाद उसे खत्म किए जाने की भी एक प्रक्रिया होती है।

ठोस और स्थायी सुधार का यही रास्ता है। लेकिन उस पर गौर करने और एक सुचिंतित रास्ता अख्तियार करने के बजाय अगर तात्कालिक तौर पर सिर्फ बेलगाम प्रतिक्रिया जाहिर की जाती है तो आमतौर पर वह समाज के भिन्न वर्गों के बीच महज विवाद का जरिया बन कर रह जाती है। खासतौर पर राजनीतिकों और नेताओं को इस तरह के विवादित बोल से बचने की जरूरत होती है, क्योंकि समाज की दिशा तय करने में उनका खासा प्रभाव होता है और उनका एक व्यापक समर्थक वर्ग भी होता है।

किसी धार्मिक मसले पर उदयनिधि स्टालिन की अपनी राय हो सकती है, लेकिन उसे अपने से असहमत लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का जरिया बनाने से बचना चाहिए। उन्होंने यह धीरज रखना जरूरी नहीं समझा। हालांकि बाद में सफाई पेश की कि उन्होंने लोगों को खत्म करने की बात नहीं कही, बल्कि सिर्फ धर्म की आलोचना की है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राजनेताओं के मुंह से निकली बात के असर की रफ्तार थोड़ी तेज होती है।

भड़काने वाले बयानों के बाद नाहक ही विवाद की ऐसी स्थितियां पैदा हो जा सकती हैं, जिसे संभालने के लिए खुद नेताओं को अतिरिक्त उर्जा लगानी पड़ती है।

भारत अपनी विविधता की संस्कृति के लिए ही जाना जाता रहा है। यहां अनेक धर्म-मत के लोग सदियों से मिलजुल कर एक साथ रहते आए हैं और आमतौर पर एक दूसरे की आस्थाओं का सम्मान ही करते हैं। इस लिहाज से देखें तो राजनीतिक तबके को इसका ज्यादा खयाल रखने की जरूरत है कि धार्मिक मसलों पर टिप्पणियां करके बेमानी विवाद न खड़े किए जाएं। इसके बजाय सुधार और बदलाव के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।