सहजीवन यानी बिना विवाह के युवा जोड़ों के साथ रहने पर लंबे समय से बहस होती रही है। समाज का एक बड़ा हिस्सा इसे अनुचित मानता है। मगर निजता के संवैधानिक अधिकारों के चलते इस पर कोई कानूनी अंकुश लगाना संभव नहीं है। अब उत्तराखंड सरकार ने सहजीवन को अवैध तो करार नहीं दिया है, पर मर्यादित करने का प्रयास जरूर किया है।
समान नागरिक संहिता विधेयक में उसने एक प्रावधान सहजीवन को लेकर भी शामिल किया है। उसके तहत कोई भी प्रेमी युगल अगर सहजीवन में रहता या रहना चाहता है, तो उसे पहले क्षेत्रीय पंजीयक के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर उन दोनों में से किसी की उम्र इक्कीस वर्ष से कम है, तो पंजीयक उसके माता-पिता को भी इस संबंध में सूचना देगा।
उनकी मंजूरी के बाद ही संबंधित जोड़े के सहजीवन में रहने का पंजीकरण हो सकता है। अगर कोई जोड़ा पंजीकरण नहीं कराता है, तो उसे तीन महीने की कैद या दस हजार रुपए जुर्माने का दंड या दोनों भोगना पड़ सकता है। इसे लेकर विपक्षी दल स्वाभाविक रूप से एतराज जता रहे हैं। वे इस प्रावधान पर कुछ ठहर कर विचार करने की मांग कर रहे हैं।
सहजीवन को मर्यादित बनाने के पीछे सरकार की मंशा समझी जा सकती है। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में बिना विवाह के साथ रह रहे प्रेमी युगल के बीच अनबन और विच्छेद की अनेक ऐसी अप्रिय घटनाएं हो चुकी हैं, जिनसे निपटना प्रशासन के लिए मुश्किल साबित हुआ। कई लड़कियों की बेरहमी से हत्या कर दी गई।
बहुत-सी लड़कियां सहजीवन में रहने के बाद ठगी महसूस करती हैं। ऐसे मामलों में घरेलू हिंसा, संपत्ति का अधिकार, भरण-पोषण के दावे आदि के कानूनी प्रावधान लागू नहीं होते। इसलिए ऐसे अनेक मामलों में अदालत में गुहार लगाने के बाद भी लड़कियों को न्याय नहीं मिल सका है। उत्तराखंड सरकार इन्हीं समस्याओं से पार पाने के इरादे से यह कानून लागू करना चाहती है।
सहजीवन संबंधी प्रावधान में स्पष्ट उल्लेख है कि पंजीकरण के बाद साथ रहने वाले प्रेमी युगल के संबंधों को कानूनी रूप से वैध माना जाएगा और महिला को वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे, जो विवाह के बाद प्राप्त होते हैं। उनसे पैदा हुए बच्चे को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त होगा। अगर लड़का किन्हीं स्थितियों में लड़की को छोड़ देता है, तो लड़की उससे भरण-पोषण पाने की हकदार होगी।
एक तरह से यह कानून सहजीवन को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। कई बार कुछ जोड़े तय कर चुके होते हैं कि वे विवाह करेंगे, इसके लिए उनके परिवार वालों की भी मंजूरी होती है, मगर पढ़ाई-लिखाई, रोजगार आदि की विवशताओं के चलते वे विवाह को टाल देते हैं। विवाह से पहले साथ रहने लगते हैं। ऐसे जोड़ों को पंजीकरण से शायद ही कोई दिक्कत हो।
मगर जो युवा चोरी-छिपे, बस शारीरिक सुख के लिए साथ रहने लगते हैं, उनमें विवाद की गुंजाइश सदा बनी रहती है। ऐसे ही जोड़ों को मर्यादित करने के लिए ऐसे कानून की जरूरत महसूस की गई होगी। मगर निजता के समर्थक कुछ लोगों को यह कानून नैतिक निगरानी रखने का प्रयास लग सकता है। निजता के अधिकार की रक्षा अवश्य होनी चाहिए, मगर इस अधिकार की आड़ में या इसका बेजा फायदा उठाते हुए अगर कुछ लोग समाज और व्यवस्था के सामने मुश्किलें पैदा करते हों, तो उन्हें अनुशासित करने की जिम्मेदारी से भला कोई राज्य कैसे बच सकता है।
