उदारीकरण के दौर में श्रमिक संघों की हड़ताल को पहले के मुकाबले समर्थन मिलना कम हो गया है। इसकी बुनियादी वजह यह आम धारणा है या बनाई गई है कि हड़ताल से देश को केवल नुकसान होता है। दूसरे, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी निवेश आकर्षित करने तथा श्रम संबंधी नियम-कानूनों को निवेशकों के अनुकूल बनाने की नीतियां अब अपरिहार्य हैं और इन्हें बदलना या रोकना वक्त का पहिया उलटा घुमाना होगा। लेकिन दूसरी तरफ श्रम कानूनों में पिछले कुछ सालों में किए गए बदलावों और प्रस्तावित संशोधनों को लेकर कर्मचारियों व कामगारों में व्यापक नाराजगी है और इसे प्रकट करने के लिए हड़ताल का सहारा लेना उन्हें जरूरी जान पड़ता है। मूल में जाकर देखें तो ऐसी हड़ताल, जो छिटपुट या किसी स्थानीय मांग को लेकर न हो, बल्कि सारे देश के कामगारों को शामिल करके हुई हो, आर्थिक सुधारों के एक बुनियादी विरोधाभास को उजागर करती है, वह यह कि नीतियां और कानून बनाने में उद्योग समूहों की राय को तो खूब तवज्जो दी जाती है, पर अर्थतंत्र व समाज के दूसरे घटकों की अनदेखी की जाती है।
यही कारण है कि उदारीकरण को लेकर आम सहमति का चाहे जितना दावा किया जाता हो, इसके प्रति असंतोष का दायरा बहुत व्यापक है। चूंकि औद्योगिक श्रमिक संगठित हैं, इसलिए इस असंतोष की एकजुट अभिव्यक्ति कभी-कभी हो जाती है, बाकी समूहों की व्यथा दबी रहती है। शुक्रवार को हुई हड़ताल का मिला-जुला असर रहा। अलबत्ता केरल जैसे वामपंथी गढ़ में इसका सबसे ज्यादा असर देखने में आया। इस हड़ताल में आरएसएस-भाजपा से जुड़े भारतीय मजदूर संघ को छोड़ कर सभी प्रमुख श्रमिक संघों और पंद्रह करोड़ से ज्यादा श्रमिकों ने हिस्सा लिया। अगर केंद्र में भाजपा के बजाय किसी और पार्टी या गठबंधन की सरकार होती, क्या तब भी भारतीय मजदूर संघ का यही फैसला होता? राहत की बात यह रही कि अस्पतालों और रेलवे आदि को आपात सेवा मान कर हड़ताल से अलग रखा गया था।
मजदूर संघों की शिकायत है कि सरकार एक तरफ महंगाई कम करने में नाकाम रही, दूसरी तरफ श्रमिकों को उचित मजदूरी और पेंशन जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। रक्षा क्षेत्र तथा रेलवे के दरवाजे एफडीआइ के लिए खोलने और श्रम कानूनों के श्रमिक हितैषी प्रावधानों को कमजोर किए जाने से कामगारों में असुरक्षा का भाव है। न्यूनतम मजदूरी अठारह हजार के स्थान पर सिर्फ 9100 रुपए मासिक किए जाने से उनमें और भी नाराजगी है। केंद्रीय श्रमिक संघों ने अपनी बारह सूत्री मांगों में न्यूनतम मासिक वेतन अठारह हजार रुपए और न्यूनतम मासिक पेंशन तीन हजार रुपए सुनिश्चित करने की मांग उठाई है। इन मांगों से जाहिर है कि संगठित क्षेत्र में आर्थिक सुधारों का लाभ काफी लोगों तक नहीं पहुंचा है और वे अपना हिस्सा मांग रहे हैं। इस तरह के असंतोष ने ही यूनान में आर्थिक सुधारों को अलोकप्रिय बना दिया और ब्रिटेन का रास्ता यूरोपीय संघ से अलग कर दिया। इसलिए यह जरूरी है कि आर्थिक सुधारों को समावेशी बनाया जाए तथा श्रम कानूनों में उत्पादकता, उद्यमशीलता और कार्य संस्कृति को संरक्षण व प्रोत्साहन देने के साथ-साथ श्रमिकों के बेहतर पारिश्रमिक और रोजगार सुरक्षा को भी अहमियत दी जाए। फिर, भारत जैसे देश में अधिकांश श्रम-शक्ति असंगठित क्षेत्र में काम करती है। उनके लिए न्यूनतम आय और पेंशन की मांग कौन उठाएगा!
है। क्या गोवा प्रकरण भविष्य की एक झांकी है?

