किसी व्यक्ति की फोन पर बातचीत को टैप करने से उठे विवादों से जुड़ी खबरें जब-तब आती रही हैं। लेकिन रविवार को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने जिस तरह दो निजी जासूसी एजेंसियों का पर्दाफाश किया और चार लोगों को गिरफ्तार किया, वह कानून को ताक पर रख कर सामान्य नागरिकों की आपसी बातचीत की गोपनीयता को भंग करने, उसका कारोबार करने का मामला जरूर है, पर इसके खतरे का दायरा इससे कहीं ज्यादा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई निजी जासूसी संस्था अपने ग्राहकों को मांगी गई सेवा देने के लिए अगर सरकारी महकमों के संवेदनशील पदों पर बैठे लोगों का इस्तेमाल करती है और वहां से लोगों की बातचीत का सारा ब्योरा निकाल लेती है तो यह सुरक्षा से जुड़ा कितना गंभीर सवाल है।

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा गैरकानूनी तरीके से सीडीआर यानी ‘कॉल डिटेल रिकॉर्ड’ की बिक्री की एक सूचना की छानबीन में लगी थी। इसी क्रम में उसने दो निजी जासूसी एजेंसियां चलाने वाले चार लोगों को पकड़ा, जिन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस के कानपुर स्थित आइजी आॅफिस में सर्विलांस सेल के तहत काम करने वाले एक पुलिसकर्मी की मिलीभगत से हजारों लोगों की सीडीआर हासिल कर उन्हें ऊंची रकम लेकर बेचा। इसके ग्राहकों में व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी, सामान्य आपसी झगड़ों से लेकर प्रेम संबंधों में पड़े लोगों और विवाह के दोनों पक्ष भी शामिल हैं। इन जासूसी एजेंसियों के ग्राहक किसी व्यक्ति की बातचीत का ब्योरा हासिल करने के लिए इनसे संपर्क करते थे और वहां पांच हजार से लेकर तीस हजार या इससे भी ऊंची रकम वसूल कर उन्हें यह जानकारी मुहैया कराई जाती थी।

दरअसल, संचार माध्यमों के क्षेत्र में आधुनिक तकनीकी ने दो लोगों के बीच संवाद को आसान बनाया है। लेकिन तकनीकी का ही सहारा लेकर जब दो लोगों की आपसी बातचीत पर नजर रखी जाती है या उनकी गोपनीयता को दूसरे को बेचा जाता है, तब इसके खतरे भी समझ में आते हैं। न सिर्फ व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता और आपसी झगड़ों में लोग एक दूसरे की गोपनीय जानकारियां हासिल करने के लिए इन जासूसी एजेंसियों का सहारा ले रहे हैं, बल्कि एक आपसी भरोसे पर टिके प्रेम या विवाह जैसे रिश्ते भी अब शक और खुफियागीरी की जद में आ गए हैं। ताजा मामले में सूचनाओं की अवैध बिक्री का जो ब्योरा सामने आया है, वह पहली नजर में किसी निजी जासूसी एजेंसी के लिए एक सामान्य बात लगती है।

लेकिन सवाल है कि जो संस्था किसी व्यक्ति को पांच से तीस-चालीस हजार रुपए के बदले सीडीआर बेच रही हो, क्या वह ज्यादा ऊंची रकम के बदले देश की सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज हासिल कर उन्हें किसी अवांछित और खतरे का वाहक बनने वाले व्यक्ति या पक्ष को नहीं दे सकती? पकड़े गए लोगों में से एक आदित्य शर्मा को 2013 में अरुण जेटली के सीडीआर निकलवाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और दूसरा जयवीर सिंह राठौड़ फिलहाल एक टीवी समाचार चैनल का मालिक है। इसके अलावा, चिंताजनक पहलू यह भी है कि निजी जासूसी एजेंसी चलाने वाला एक व्यक्ति सीबीआइ का पूर्व अधिकारी रह चुका है। सीबीआइ जैसी सरकारी एजेंसी में काम कर चुका व्यक्ति अगर इस तरह गैरकानूनी जासूसी के धंधे में लिप्त है तो खतरे की गंभीरता समझी जा सकती है।