जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में भारतीय सैनिकों के शव क्षत-विक्षत करने को लेकर विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त को तलब कर कड़ी चेतावनी दी है। पाकिस्तान का कहना था कि पुंछ की घटना में उसके सैनिकों का हाथ नहीं था। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने पुख्ता सबूत सौंपे हैं, जिनसे साबित होता है कि पाकिस्तानी बॉर्डर ऐक्शन टीम के लोगों ने ही उस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया था। पहले बट््टल क्षेत्र की पाकिस्तानी चौकियों से राकेट और मोर्टार दागे गए, जिसकी आड़ में वहां की बॉर्डर एक्शन टीम के लोग भारतीय सीमा में ढाई सौ मीटर तक घुस आए और घात लगा कर भारतीय सुरक्षा दस्ते पर हमला किया, फिर उनके शवों को क्षत-विक्षत कर दिया। खून के निशान से साफ पता चलता है कि हमलावर पाकिस्तानी चौकियों की तरफ लौटे थे। इन सबूतों के बाद पाकिस्तान का मुंह बंद है। भारत सरकार ने दोषी सैनिकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। मगर उधर से शायद ही कोई सकारात्मक कदम उठाया जा सके।
इसके पहले भी दो मौकों पर पाकिस्तानी सेना भारतीय सैनिकों के शवों को क्षत-विक्षत कर चुकी है, मगर उनसे जुड़े पुख्ता सबूत मिलने के बावजूद पाकिस्तान ने कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं की। वह लगातार नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन करता आ रहा है, पर लाख लानतों के बावजूद उस पर कोई असर नहीं पड़ता। उसे अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों की भी परवाह नहीं रह गई है। पिछले एक साल में सैनिक अड््डों और नियंत्रण रेखा के गश्ती दलों पर हुए हमलों में न सिर्फ आतंकवादियों, बल्कि वहां की सेना के हाथ होने के पुख्ता सबूत हैं। यह भी छिपी बात नहीं है कि वहां की बॉर्डर एक्शन टीम में आतंकी भी शामिल हैं। नियंत्रण रेखा के पार बॉर्डर एक्शन टीम के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं। मगर भारत की तरफ से पेश किए गए हर सबूत को पाकिस्तान खारिज करता रहा है। इस बार भी भारत की कड़ी चेतावनी को वह शायद ही गंभीरता से ले।
जब भी नियंत्रण रेखा या फिर नागरिक ठिकानों पर सैनिक या कोई आतंकी हमला होता है, जिसमें पाकिस्तानी सैनिकों या सीमा पार के आतंकी संगठनों का हाथ होने के सबूत होते हैं, भारत सरकार लंबे समय से इसी तरह कड़ी चेतावनी देकर अपना कर्तव्य पूरा समझती आ रही है। पठानकोट और फिर अटारी में सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद भारत सरकार ने कुछ रणनीतिक कदम उठाने का दम भरा था, मगर उसका कोई नतीजा नहीं निकला। सार्क सम्मेलन रद्द कराने और फिर आर्थिक नाकेबंदी की कोशिशों से पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश जरूर की गई, मगर उसका भी कोई गंभीर असर नजर नहीं आता। बल्कि कश्मीर घाटी में अस्थिरता पैदा करने में वह लगातार कामयाब साबित हो रहा है। ऐसे में भारत सरकार से किसी कठोर कदम की उम्मीद स्वाभाविक है। सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान और कुछ हद तक वाणिज्यिक गतिविधियों पर लगाम लगा कर या बातचीत का सिलसिला रोक कर, तनातनी का माहौल बनाए रखने से नियंत्रण रेखा पर अमन की उम्मीद नहीं की जा सकती। दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद और सीमा पर कड़ी निगरानी जरूरी है। उन पहलुओं का भी विश्लेषण करने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों से तमाम दबावों के बावजूद क्यों पाकिस्तान अपनी सेना और वहां पनाह पाए आतंकी संगठनों पर लगाम कसने की पहल करता नहीं दिखता। पाकिस्तान को लेकर एक व्यावहारिक नीति बननी चाहिए।

