पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जबर्दस्त कामयाबी मिलने के प्रमुख कारणों में एक, महंगाई को लेकर लोगों का आक्रोश भी था। पर अब वह इसी मसले पर बचाव की मुद्रा में है। यह इससे भी जाहिर है कि गुरुवार को जब राहुल गांधी ने लोकसभा में महंगाई के मसले पर सरकार को घेरा, तो जवाब में वित्तमंत्री अरुण जेटली का सबसे बड़ा दांव यूपीए के दिनों की याद दिलाना था। यह सही है कि यूपीए के दूसरे कार्यकाल में आम लोग महंगाई से बुरी तरह त्रस्त थे, लेकिन इसी का हवाला देकर सरकार अपना बचाव नहीं कर सकती। राहुल गांधी ने खासकर दालों और सब्जियों की कीमतें चढ़ते जाने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महंगाई पर काबू पाने का अपना वादा भूल गए हैं।

मोदी भूले हों या नहीं, उनकी सरकार बनने के बाद एक साल तक जो राहत लोग महसूस कर रहे थे, वह अब नहीं है। पिछले बारह-चौदह महीनों में सारे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं, दालों के दामों में तो डेढ़ गुनी-दो गुनी बढ़ोतरी हुई है। सरकार का मानना है, जैसा कि जेटली ने अपने जवाब में कहा, कि मांग और आपूर्ति के बीच की खाई दालों की कीमतें चढ़ने की बड़ी वजह है। इस तर्क को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। सरकार ने दालों की कमी पूरी करने के लिए आयात बढ़ाने के कई करार किए हैं। पर दलहन की पैदावार बढ़ाने के लिए अपने किसानों को प्रोत्साहन की क्या योजना बनाई गई है? दूध के दाम भी थोड़े-थोड़े अंतराल पर बढ़ते गए हैं। सच तो यह है कि यूपीए सरकार के अंतिम दो साल और मोदी सरकार के दो साल में महंगाई के लिहाज से कोई अंतर है, तो पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों मेें। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का जो भाव था आज उसका आधा या उससे भी कम है। फिर भी लोगों को महंगाई रोजाना चुभ रही है। अगर कच्चे तेल के दाम यूपीए के दिनों जैसे हो जाएंगे, तो हालत क्या होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। जेटली ने सूखे का हवाला देते हुए भी अपनी सरकार का बचाव करने की कोशिश की है।

यह सही है कि महंगाई की एक वजह बहुत बार मौसमी होती है, खासकर खाद्य पदार्थों के मामले में। पर आज महंगाई की दर पांच फीसद से ऊपर है, तो कई तरह के उप-कर का योगदान भी इसमें होगा ही। सवाल है कि भाजपा महंगाई पर काबू पाने का जो दम भरती थी, उसका क्या हुआ? अपने चुनाव घोषणापत्र में उसने मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाने की बात कही थी, पर इस बारे में अभी तक कोई पहल नहीं हुई है। फिर, महंगाई खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है, यह सबसे ज्यादा जहां चुभ रही है वह है इलाज और शिक्षा के क्षेत्रों में। पर उसकी चर्चा कोई नहीं कर रहा, विपक्ष भी नहीं। महंगाई का मुद्दा संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के बीच बढ़ती खाई की ओर भी इशारा करता है। संगठित क्षेत्र अपनी वेतन-वृद्धि, भत्तों और मुनाफों के बल पर महंगाई की मार से बचा रहता है, पर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की मुश्किलें और बढ़ती जाती हैं। इसलिए उचित ही महंगाई को ‘गरीबों पर टैक्स’ कहा जाता है। हमारे देश में एक छोटा-सा तबका ही संगठित क्षेत्र में आता है, अधिकांश आबादी असंगठित क्षेत्र से ही ताल्लुक रखती है। महंगाई से निपटने की चुनौती असल में इस खाई को पाटने की चुनौती है