आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित बाबरी मस्जिद तोड़ने के आपराधिक षड्यंत्र में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित तेरह भाजपा नेताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने संबंधी सीबीआइ की याचिका स्वीकार कर ली है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी सभी जांचें चार सप्ताह के भीतर पूरी कर लेने और मामले से जुड़े किसी भी न्यायाधीश का तबादला न करने का आदेश दिया है। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े सभी मामले अब एक ही अदालत में सुने जाएंगे। रायबरेली अदालत में दर्ज मुकदमे लखनऊ न्यायालय में स्थांतरित हो जाएंगे। पच्चीस साल पहले हुई इस घटना को लेकर अब तक अदालतें किसी संतोषजनक निर्णय पर नहीं पहुंच पाई हैं। सीबीआइ ने अपनी जांच में स्पष्ट कहा है कि बाबरी मस्जिद ढहाने में लालकृष्ण आडवाणी समेत भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की साजिश थी। उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए और कारसेवकों को मस्जिद गिराने के लिए उकसाया। मगर निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक नई याचिकाओं और पुनर्विचार याचिकाओं के दायर होते रहने से मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा था। फिर राज्य और केंद्र सरकार की ढिलाई के चलते भी यह मामला खिंचता गया। उच्च न्यायालय ने लालकृष्ण आडवाणी को बरी कर दिया था, पर सीबीआइ ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई तो अब यह आदेश आया है।

सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश से उम्मीद जगी है कि विवादित बाबरी मस्जिद तोड़ने के मामले में कोई संतोषजनक फैसला आ सकेगा। मगर इसमें कुछ लोगों को राजनीतिक रंग दिखाई देने लगा है। विपक्षी दलों का कहना है कि नरेंद्र मोदी सरकार की लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर करने की सोची-समझी रणनीति के तहत यह आदेश आया है। मगर इस तरह के बयानों से अदालत की निष्पक्षता और सीबीआइ के कामकाज पर भी एक तरह से अंगुली उठती है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच मतभेद की खबरें उभरती रही हैं। गुजरात दंगों से जोड़ कर देखा जाता रहा है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी और लग रहा था कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है, तब आडवाणी ने मोदी को बचाने का प्रयास नहीं किया। फिर जब मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित कर दिए गए तब भी आडवाणी को गहरा धक्का लगने की बातें कही जाती हैं। बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डाल कर एक तरह से पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से अलग कर दिया। इससे मोदी और आडवाणी के रिश्तों की खटास उजागर जरूर होती है, पर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश से इस खटास को जोड़ना जल्दबाजी होगी।

राष्ट्रपति पद के लिए लालकृष्ण आडवाणी का नाम भरी बैठक में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रस्तावित कर चुके हैं। अगर उन्हें राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर करना ही होता तो उन पर आपराधिक मुकदमा चलाने का रास्ता अख्तियार करना इसलिए नहीं गले उतरता कि इससे आखिर पार्टी की छवि पर भी आंच आएगी। फिर इस मामले में अकेले आडवाणी शामिल नहीं हैं। मोदी मंत्रिमंडल की सदस्य उमा भारती भी हैं। उमा भारती ने तो स्पष्ट कह दिया है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए खुल्लम खुल्ला अभियान चलाया, कोई साजिश नहीं की थी। इसलिए इस मामले को राजनीतिक रंग देने के बजाय अदालत से अंतिम निपटारे का इंतजार करना चाहिए।