प्रगति के कई सोपान पार करने के बावजूद भारत में अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं। इस देश की यह ऐसी स्याह तस्वीर है, जिसकी आमतौर पर अनदेखी की जाती रही है। आए दिन जादू-टोने के अंधविश्वास में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी जाती है। यों देश के सभी हिस्सों से इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ समय के दौरान बिहार, झारखंड और असम में हुई ऐसी कई घटनाओं ने व्यापक चिंता पैदा की है। गौरतलब है कि असम के कार्बी आंगलोंग जिले में मंगलवार रात हुई घटना ने एक बार फिर सबको झकझोर दिया है। वहां एक गांव के कुछ लोगों ने जादू-टोना किए जाने के संदेह में घर में घुस कर एक दंपति पर पहले धारदार हथियारों से हमला किया, फिर उनके घर में आग लगा दी। इससे पति-पत्नी की जल कर मौत हो गई।

ग्रामीण इलाकों में जादू-टोने या डायन होने का आरोप लगा कर अक्सर महिलाओं को सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और कई बार उन्हें मार भी दिया जाता है। हालांकि शहर भी अंधविश्वासों से मुक्त नहीं हैं। यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जो विकास के आधुनिक पैमानों को मुंह चिढ़ाती है, लेकिन इसके निवारण के लिए कभी ईमानदार इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई।

हैरानी की बात यह है कि जिस दौर में देश और दुनिया तकनीक के क्षेत्र में चरम विकास के दौर में है, उसमें महज वहम या अंधविश्वास की वजह से कई लोग अपने परिवार के लोगों के बीमार होने पर डाक्टर से इलाज कराने के बजाय उसे किसी जादू-टोने का नतीजा मानते हैं। विकास के तमाम दावों के बीच यह हकीकत है कि देश में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को लेकर सरकारें कभी गंभीर नहीं रहीं। जबकि देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का दायित्व संवैधानिक तौर पर भी दर्ज है।

इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय सरकारें किसी घटना विशेष के संदर्भ में कानून की सीमा में कदम उठाती हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर वैज्ञानिक चेतना निर्माण को लेकर कोई ठोस योजना जमीन पर नहीं दिखती। अलग-अलग राज्यों में इस मसले पर बने कानून हैं, मगर लोगों के भीतर सोच के स्तर पर गहरे तक बैठा अंधविश्वास कानूनों के असर को बेमानी बना देता है।