देश में आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं अब आम लोगों के लिए गंभीर समस्या बन गई है। खासकर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए गली-मोहल्लों में सड़क पर चलना खतरे से खाली नहीं है। पिछले कई वर्षों से यह मसला सत्ता के गलियारों से लेकर सड़क तक उठता रहा है, लेकिन इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। हालांकि, केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, लेकिन नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ जैसा ही है।

यही वजह है कि मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना पड़ा कि कुत्ते के काटने की घटनाओं में राज्यों को भारी मुआवजा देने के निर्देश दिए जाएंगे, क्योंकि पिछले पांच वर्षों में आवारा पशुओं से संबंधित नियमों के क्रियान्वयन के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए। साथ ही यह भी कहा कि कुत्तों को सड़क पर भोजन खिलाने वालों को भी जिम्मेदार और जवाबदेह ठहराया जाएगा। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी को इसलिए महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इस संकट से निपटने के लिए न तो राज्य सरकारों की ओर से प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं और न ही कुत्तों को सड़क पर भोजन परोसने पर रोक लग पाई है।

केंद्रीय पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की तरफ से पिछले वर्ष जारी आंकड़ों पर गौर करें, तो देश में जनवरी 2024 से लेकर दिसंबर तक कुत्ते के काटने के सैंतीस लाख से अधिक मामले सामने आए। इनमें पांच लाख से ज्यादा मामले पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चों के थे। जबकि कुत्ते के काटने से करीब सैंतीस लोगों की मौत हो गई, जिनमें ज्यादातर मामले रेबीज संक्रमण के थे। इन आंकड़ों से स्थिति की गंभीरता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

इस समस्या से निजात पाने का सरल एवं प्रभावी उपाय आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करना माना जाता है। इसके लिए विभिन्न राज्यों में टीकाकरण के जरिए कुत्तों का बंध्याकरण करने का कार्यक्रम शुरू किया गया था, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही और इच्छाशक्ति के अभाव में यह मुहिम कागजों में ही दम तोड़ती नजर आ रही है। यही वजह है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ रही है और इंसानों को काटने की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

शीर्ष अदालत ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पिछले दिनों आक्रामक आवारा कुत्तों को सड़क से हटाकर आश्रय स्थलों में रखने का निर्देश दिया था। साथ ही गली-मोहल्लों में कुत्तों को सड़क पर भोजन नहीं परोसने की हिदायत भी दी थी। मगर पशु प्रेमियों को यह फैसला रास नहीं आया और यह मामला फिर से सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया।

इसमें दोराय नहीं है कि आवारा कुत्तों को सुरक्षित और खुला वातावरण मिलना चाहिए, लेकिन इस बात को भी समझना जरूरी है कि मानव सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने भी यह सवाल उठाया है कि अगर पशु प्रेमियों को आवारा कुत्तों से लगाव है, तो वे उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? दरअसल, कुत्तों को सड़क पर भोजन परोसे जाने से वे वहीं आसपास घूमते रहते हैं और स्थानीय लोगों को काटते और डराते हैं। ऐसे में इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि सरकार और समाज के सामूहिक प्रयासों से ही इस समस्या से निपटने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।