प्रधानमंत्री ने एक बार फिर डिजिटल अर्थव्यवस्था की वकालत की है। शुक्रवार की सुबह भाजपा के संसदीय दल को संबोधित करते हुए उन्होंने जहां विपक्ष को इस बात के लिए कोसा कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में सरकार के साथ नहीं है, वहीं अपनी पार्टी के सांसदों की हौसलाआफजाई करते हुए कहा कि विमुद्रीकरण सरकार का आखिरी कदम नहीं है। विमुद्रीकरण के बाद के पहले ही हफ्ते में एक रैली को संबोधित करते हुए भी उन्होंने कहा था कि उनके दिमाग में कई परियोजनाएं हैं, साथ ही संकेत दिया था कि उनकी अगली कार्रवाई बेनामी संपत्ति के खिलाफ होगी। यानी भाजपा के सांसदों को भी यह पहले से अहसास रहा होगा कि प्रधानमंत्री का इरादा कुछ और कदम उठाने का है। ऐसे में बस यही बताने के लिए पार्टी के संसदीय दल की बैठक बुलाने की जरूरत नहीं रही होगी। दरअसल, बैठक बुलाने की जरूरत खासकर इसलिए महसूस की गई होगी, क्योंकि शुरू में जैसा माहौल दिखा था अब वैसा ही नहीं है। पांच सौ और हजार के नोटों को अमान्य करने के सरकार के फैसले को लेकर एक समय बहुत व्यापक जन-समर्थन दिख रहा था। वह समर्थन अब किस हद तक कायम है, कहना मुश्किल है, मगर साफतौर से नाराजगी के स्वर चारों तरफ सुनाई देते हैं।
लोगों का गुस्सा असल में विमुद्रीकरण के फैसले पर नहीं, बल्कि बिना तैयारी के उसे लागू करने पर है। बैंकों से अपना पैसा पाने के लिए लोगों को अंतहीन तकलीफें उठानी पड़ी हैं और अब भी इसका सिलसिला जारी है। दूसरे, अर्थव्यवस्था पर, खासकर कृषि समेत सारे असंगठित क्षेत्र पर नोटबंदी के बुरे प्रभाव दिखने लगे हैं, जो और गहरा सकते हैं। इस सब से पार्टी के भीतर भी बेचैनी होगी और पार्टी के सांसद यह जानना चाहते रहे होंगे कि हालात कब सामान्य होंगे। लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जो कुछ कहा उसमें सारा जोर अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण पर था। लेकिन सवाल है कि क्या यही रामबाण है? और यह हमारे देश में फिलहाल किस हद तक संभव है? कैशलेस लेन-देन के लिए एक के बाद एक कई रियायतों और इनामों की सरकार की घोषणा के बाद आखिरकार वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की ताजा बैठक में स्वीकार किया कि डिजिटल लेन-देन एक समांतर सुविधा है; यह नगदी को प्रतिस्थापित करने वाली नहीं है; कोई भी अर्थव्यवस्था पूरी तरह नगद-विहीन नहीं हो सकती।
इसके अलावा एक दूसरा यथार्थ भी है। साइबर अपराध का दायरा दिनोंदिन बढ़ रहा है, लगभग सारी दुनिया में। हाल में लीजन नामक हैकरों के समूह ने जिस तरह राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और दो नामचीन पत्रकारों के ट्विटर अकाउंट हैक कर लिये, और उससे पहले लाखों बैंक-खातों से आॅनलाइन सेंधमारी के जरिए पैसे निकाल लिये गए थे, उससे समझा जा सकता है कि कैशलेस लेन-देन को लेकर प्रधानमंत्री चाहे जितना उत्साहित हों, लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं हैं। ये अंदेशे एक ऐसे समाज में और भी ज्यादा होंगे जहां नेट-साक्षरता बहुत सीमित है। बिना तकनीकी दक्षता का प्रसार हुए, चंद दिनों में नगदी-रहित अर्थव्यवस्था और नगदी-रहित समाज बनाने का सपना साकार नहीं हो सकता। बेशक प्रधानमंत्री के उत्साह और सरकार के ताजा अभियान के पीछे काले धन से निपटने और भ्रष्टाचार मिटाने का नेक मकसद होगा, पर इसका यह अर्थ नहीं कि नगदी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के तकाजे को वे पीछे कर दे

