जिस तरह सोमवार को अफ्रीकी देशों के राजदूतों का साझा बयान आया, वह निश्चय ही भारत के लिए गहरी चिंता का विषय होना चाहिए। रंगभेद विरोधी संघर्ष में भारत के निरंतर पुरजोर समर्थन और दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के सत्याग्रह और उपनिवेशवाद के खिलाफ भारतीय जनता के आंदोलन ने भारत और अफ्रीका महाद्वीप के बीच भावनात्मक जुड़ाव की सशक्त पृष्ठभूमि तैयार की थी। भारत के आजाद होने पर हमारी विदेश नीति में भी यह प्रतिबिंबित हुई। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से बहुत सारे अफ्रीकी देश भी जुड़े। अलबत्ता अफ्रीका को ध्यान में रख कर, भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन की शुरुआत बहुत बाद में हुई, पिछली यानी यूपीए सरकार के समय। इस तरह की पहल के पीछे एक मकसद अफ्रीका में शायद चीन के प्रभाव की काट करना भी रहा था।
पिछली सरकार के समय कुछ गिने-चुने देश ही शिखर सम्मेलन में शरीक हुए थे। मोदी सरकार ने इस पहल को आगे ले जाते हुए सारे अफ्रीकी देशों को न्योता दिया, और लगभग सारे अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष या विदेशमंत्री आए भी। इस शिखर सम्मेलन को विदेश नीति में मोदी सरकार की एक खास उपलब्धि के तौर पर देखा गया। लेकिन आज अफ्रीका महाद्वीप और भारत के बीच जैसी खटास देखने को मिल रही है, पहले कभी नहीं थी। इसके मूल में है हाल में ग्रेटर नोएडा में हुई एक घटना, जिसमें स्थानीय भीड़ ने कुछ अफ्रीकी छात्रों पर हमला बोल दिया था। अफ्रीकी राजदूतों के साझा बयान में यह कहते हुए सख्त नाराजगी जताई गई है कि भारत ने संतोषजनक कार्रवाई नहीं की; न तो सर्वोच्च स्तर से घटना की निंदा की, न अफ्रीकी छात्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए हैं।
साझा बयान में नाराजगी का एक बिंदु यह भी है कि यह नस्ली हिंसा की घटना थी। इसी के साथ मामले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ले जाने की धमकी भी दी गई है। भारत ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने फौरन ट्वीट करके हमले की निंदा की थी और तुरंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से रिपोर्ट भी तलब की, और नोएडा, ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा। अलबत्ता भारत ने घटना को नस्ली हिंसा मानने से फिर इनकार किया है। भारत का कहना है कि यह एक आपराधिक घटना थी, और उसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए। भारत सरकार का यह भी दावा है कि सोमवार को आया साझा बयान सारे अफ्रीकी देशों के नजरिए का प्रतिनिधित्व नहीं करता; कई अफ्रीकी मिशनों ने माना है कि साझा बयान के सिलसिले में न उन्होंने किसी बैठक में हिस्सा लिया न उनसे कोई परामर्श किया गया।
पर अफ्रीकी देशों के रुख में फांक ढूंढ़ने के बजाय ज्यादा कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि ग्रेटर नोएडा जैसी घटना दुबारा न हो। बेशक भारत की आधिकारिक नीति में रंगभेद या नस्लवाद जैसी चीज के लिए कभी कोई जगह नहीं रही है, बल्कि भारत हमेशा इस सब के सख्त खिलाफ रहा है, लेकिन यही दावा हम किसी स्थानीय भीड़ के व्यवहार के बारे में नहीं कर सकते। हमारे पूर्वोत्तर के लोग भी दिल्ली और अन्य महानगरों में परेशान व अपमानित किए जाने की शिकायत करते रहे हैं। सरकार को चाहिए कि हमले के मामले में जांच और कार्रवाई जल्दी से जल्दी तर्कसंगत परिणति तक पहुंचे। संयुक्त राष्ट्र भी यही चाहता है। ऐसा होना कानूनी और नैतिक रूप से जरूरी तो है ही, कूटनीतिक रूप से भी आवश्यक है। फिर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं दिखेगी।

