देश भर की तमाम औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले जहरीले पानी और रासायनिक कचरे के निस्तारण में की जा रही घोर लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा रुख अपनाया। सर्वोच्च अदालत ने सभी राज्यों को आदेश दिया है कि अगर कोई औद्योगिक इकाई तीन महीने के भीतर अपने औद्योगिक प्रवाह शोधन संयंत्र (इटीपी) को सुचारु नहीं कर पाती है, तो फौरन उसकी बिजली की आपूर्ति बंद कर दी जाए। अदालत ने यह भी कहा है कि स्थानीय निकाय अपने क्षेत्र में साझा औद्योगिक प्रवाह शोधन संयंत्र लगवाएं और इसकी पूरी रिपोर्ट राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के सम्मुख प्रस्तुत करें। सुनवाई के दौरान कुछ राज्यों ने यह दलील भी दी कि अगर ज्यादा सख्ती की गई तो उसका क्रियान्वयन कठिन हो जाएगा। इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, ‘बस, इंसान की जिंदगी ही सबसे सस्ती रह गई है, बाकी तो हर चीज कठिन हो गई है। अगर हमने अभी शुरुआत नहीं की तो ऐसा वक्त आएगा, जब इसे संभालना असंभव हो जाएगा।’

गौरतलब है कि तमाम शोधों और सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि किसी भी राज्य में ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों में इटीपी काम नहीं कर रहे हैं। इन इकाइयों से निकलने वाला रसायनों से भरा जहरीला पानी आसपास की नदियों, जलाशयों में छोड़ा जा रहा है। तमाम जगहों पर इलाके के इलाके तबाह हो चुके हैं। आसपास के खेत बर्बाद हो चुके हैं और नदियां जहर का पनाला बन कर रह गई हैं। राज्य सरकारें हों या राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उनका रवैया अक्सर टरकाऊ ही रहता है। इसके अलावा, भ्रष्टाचार भी इस समस्या को बनाए रखने में अहम कारक है। अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि औद्योगिक इकाइयां मासिक ‘सुविधा शुल्क’ या रिश्वत देकर अपने अवैध काम को छिपाने में कामयाब हो जाती हैं। असल में, यह याद रखना जरूरी है कि अगर दूषित जल नदी, नालों या सरोवरों में जाता है तो वह फिर धरती की ऊपरी तह को ही नहीं, भूगर्भ जल को भी जहरीला करता है। और अंत में वह न केवल मानव, बल्कि सभी जीव-जंतुओं के लिए खतरनाक ही सिद्ध होता है। इसलिए समय रहते इस पर काबू किया जाना जरूरी है।

अदालत ने राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से कहा है कि वे पहले औद्योगिक इकाइयों को इटीपी सुचारु करने का नोटिस जारी करें। अगर तीन महीने के भीतर सबकुछ पूरी तरह चाक-चौबंद नहीं मिलता तो राज्य सरकारों को दोषी इकाइयों की विद्युत आपूर्ति रोक देनी होगी। यह बिजली तब तक वापस नहीं जोड़ी जाएगी, जब तक कि संयंत्र पूरी तरह दुरुस्त नहीं कर लिया जाता। राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि वे इस काम को मिशनरी भाव से करने में जुट जाएं। कुछ राज्यों की ओर से कहा गया था कि इटीपी लगे हैं, लेकिन धनाभाव के कारण वे बंद पड़े हैं। इस पर अदालत ने कहा कि स्थानीय निकायों को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वे उपयोगकर्ताओं से औद्योगिक और घरेलू कर वसूल सकते हैं। यह स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे सीइटीपी की स्थापना खुद करें। जरूरत हो तो वे कर लगा कर अपनी वित्तीय स्थिति ठीक कर सकते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस आदेश के बाद राज्यों और औद्योगिक इकाइयों के रवैए में फर्क आएगा।