स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को प्रधानमंत्री का संबोधन अमूमन रस्मी ही होता आया है। कई बार अपनी सरकार के कामों का ब्योरा इसे नीरस भी बना देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले संबोधन को याद करें, तो कह सकते हैं कि उन्होंने किसी हद तक लीक तोड़ी थी, जब साफ-सफाई और बालिका सशक्तीकरण पर उन्होंने विशेष जोर दिया था। मगर इस बार अपनी सरकार के कामों का बखान करने में उन्होंने तनिक संकोच नहीं किया। क्या इसका कारण कुछ राज्यों के आगामी चुनाव हैं? जो हो, अलबत्ता इस बार भी प्रधानमंत्री के पंद्रह अगस्त के संबोधन में एक नई बात परिलक्षित की गई, पर वह किसी आंतरिक मसले से नहीं, विदेश नीति से, या यह कहना ज्यादा सही होगा कि पाकिस्तान की बाबत सरकार की नीति से संबंधित थी। मोदी ने स्वराज को सुराज में बदलने का संकल्प जताया और सुराज को आम आदमी के प्रति संवेदनशीलता के रूप में परिभाषित किया। फिर इसी क्रम में वे अपनी सरकार के सारे अहम काम गिनाते गए। कारोबारी माहौल बनाने, महंगाई को छह फीसद से नीचे रखने, नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करने, बीपीएल परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, वन रैंक वन पेंशन, उज्ज्वला योजना, बिजली से वंचित अठारह हजार गांवों में से दस हजार गांवों का विद्युतीकरण, जीएसटी विधेयक को संसद की मंजूरी और स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन में बीस फीसद की बढ़ोतरी आदि के बारे में बता कर उन्होंने भरोसा दिलाना चाहा कि सरकार लोगों से किए वादे के अनुरूप ही काम कर रही है। इसमें दो राय नहीं कि उन्होंने अपनी सरकार का पक्ष बहुत मजबूती से रखा। साथ ही उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाए के भुगतान और गुरु गोबिंद सिंह की तीन सौ पचासवीं जयंती का जिक्र कर उन्होंने उत्तर प्रदेश और पंजाब का दिल जीतने की कोशिश की, जहां कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने जाने क्यों काले धन का जिक्र नहीं किया।
स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने यानी किसानों को उपज की लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाने का वादा अब मोदी क्यों नहीं याद करना चाहते? आतंकवाद के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पाकिस्तान को बाज आने की चेतावनी अममून पंद्रह अगस्त के हर राष्ट्रीय संदेश में मिल जाएगी। इस बार कोई नई बात थी तो यही कि प्रधानमंत्री ने बलूचिस्तान तथा पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के हाथों हो रहे मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठा कर पाकिस्तान के प्रति सरकार के रुख या रणनीति में बदलाव के संकेत दिए। यों पिछले दिसंबर में मोदी ने पाकिस्तान से दोस्ती की दिशा में एक अप्रत्याशित कदम उठाया था, जब वे अफगानिस्तान से लौटते हुए अचानक नवाज शरीफ के घर जा पहुंचे थे। लेकिन पहले पठानकोट और अब कश्मीर में अशांति फैलाने में पाकिस्तान की भूमिका और पिछले दिनों सार्क के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इस्लामाबाद जाने पर वहां ऐन सम्मेलन स्थल के बाहर उग्रपंथियों को विरोध-प्रदर्शन की इजाजत देने के पाकिस्तान के रवैए, आदि अनुभवों ने सरकार को अपना रुख नए सिरे से तय करने के लिए प्रेरित किया होगा। चीन और पाकिस्तान का साझा आर्थिक गलियारा बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित होकर जाता है। तो क्या पाकिस्तान पर उंगली उठा कर कही गई बात में परोक्ष रूप से चीन के लिए भी चेतावनी निहित थी? पाकिस्तान संबंधी नीति के इस बदले हुए रुख से क्या हासिल होगा, इस पर फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

