प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस अमेरिका यात्रा की अहमियत जाहिर है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह अमेरिका का उनका पहला सफर है। अलबत्ता नवंबर से टेलीफोन पर दोनों नेताओं की तीन बार बात हो चुकी है। ट्रंप के साथ वाइट हाउस में मोदी की होने वाली मुलाकात से पहले दो-तीन घटनाओं ने यही जताया कि संबंधों को और प्रगाढ़ करने की ललक दोनों तरफ है। मोदी दो मौकों पर अपनी बात रख चुके हैं। एक, अमेरिका में रह रहे भारतवंशियों के सामने, और दो, दुनिया भर में कारोबार करने वाली अमेरिका की कुछ कंपनियों के दिग्गजों के सामने। अमेरिका निवासी भारतवंशी समद्धिशाली तो हैं ही, उनमें से कई लोग वहां बहुत ऊंचे पदों पर विराजमान हैं और नीति-निर्धारण में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें संबोधित करते हुए मोदी ने जो कुछ कहा उसके पीछे इरादा बस भावनात्मक रिश्ते की याद दिलाना भर नहीं था, बल्कि भारत के हक में अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने के लिए उनका सहयोग पाने की मंशा भी रही होगी। भारत-अमेरिका परमाणु करार के सिलसिले में ऐसा हुआ भी था।
अमेरिका के कारोबारी दिग्गजों को संबोधित करते हुए मोदी ने भरोसा दिलाना चाहा कि भारत आर्थिक सुधारों की राह पर चल रहा है और भारत में निवेश करना तथा व्यापार करना पहले से कहीं आसान हो गया है, इसलिए भारत में पूंजी लगाने में वे तनिक न हिचकें। आर्थिक सुधारों की दिशा में अपनी सरकार के नए व बड़े कदम के रूप में उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की चर्चा की। इसी के साथ उन्होंने भारत-अमेरिका का व्यापार कुछ ही बरसों में कई गुना बढ़ जाने की उम्मीद जताई। लेकिन हकीकत के धरातल पर देखें तो कहां खड़े हैं! नोटबंदी के बाद आर्थिक वृद्धि दर में आई कमी से दुनिया वाकिफ है। रेटिंग एजेंसियों ने भारत सरकार के बार-बार अनुरोध के बावजूद दर्जा नहीं बढ़ाया। कारोबार में होने वाली आसानी के दावे के बरक्स अमेरिकी कारोबारियों ने निवेश व व्यापार में आने वाली दिक्कतें दूर करने का अनुरोध किया। विडंबना यह है कि अमेरिका कहीं ज्यादा संरक्षणवाद के रास्ते पर चल रहा है। इसके चलते भारत का आइटी उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, जिसकी कमाई का साठ फीसद अमेरिकी स्रोत से आता है। यही कारण है कि एच-1 बी वीजा भारत के लिए एक बड़ा मुद््दा बन गया है और उम्मीद है कि ट्रंप से होने वाली बातचीत में मोदी इसे जोर देकर उठाएंगे।
ट्रंप और मोदी की मुलाकात ऐसे वक्त होने जा रही है जब पेरिस जलवायु समझौते पर दोनों नेताओं के तीखे मतभेद सामने आ चुके हैं। ट्रंप ने जहां अमेरिका को जलवायु करार से अलग कर लिया है, वहीं भारत ने इस करार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता फिर दोहराई है। यों अफगानिस्तान में सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से लेकर खाड़ी क्षेत्र, समुद्री आवागमन और सुरक्षा तथा आतंकवाद से लेकर आपसी व्यापार तक अनेक मसलों पर चर्चा होगी। पर सबसे ज्यादा समान रुख, जाहिर है, आतंकवाद पर होगा। संभव है, ट्रंप पाकिस्तान के प्रति सख्ती का भी संकेत दें। पर अमेरिका की दिलचस्पी सबसे ज्यादा जिस चीज में है वह है रक्षा सहयोग, जिसमें अमेरिका विक्रेता की भूमिका में होगा और भारत खरीदार के रूप में। मोदी ने कहा है कि अमेरिका से रणनीतिक संबंध का तर्क अकाट्य है। पर सवाल है कि इसे किस संदर्भ में और किस कसौटी पर परिभाषित किया जाएगा!

