आजादी के सत्तर साल पूरे होने के कारण इस बार का स्वाधीनता दिवस कुछ खास था, और स्वाभाविक ही अपेक्षया अधिक जोश-खरोश से मनाया गया। इस दिन लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन कुल मिला कर अवसरोचित ही कहा जाएगा। पहली बार जब उन्होंने स्वाधीनता दिवस पर देश को संबोधित किया था तो उसमें एक नवीनता थी। राजनीतिक बातों को कम तवज्जो देकर, उन्होंने बालिका सशक्तीकरण, साफ-सफाई और कम से कम दस साल के लिए जाति व धर्म के झगड़े भुला देने की अपील की थी। लेकिन अब उनकी सरकार को तीन साल से ज्यादा हो गए हैं। इसलिए अब लोग सरकार के मुखिया की बातों को सरकार के कामों से जोड़ कर देखते हैं। प्रधानमंत्री ने अपने लंबे भाषण में कुल मिलाकर नए भारत का सपना दिखाया, जो कि 2022 में जाकर साकार होगा! सवाल है कि इस दिशा में अभी तक क्या हुआ है। सरकार को पांच साल के लिए जनादेश मिला है, वह भी नए भारत के लिए ही था। पर अब अगले आम चुनाव के बाद की बातें की जा रही हैं!
यह सही है कि सरकार की कुछ उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं। मसलन, महंगाई काबू में रही है। काले धन के खिलाफ मुहिम चली है, जो कि बराबर जारी है। जीएसटी के रूप में एक नई कर-व्यवस्था लागू हुई है। वंचित परिवारों को उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस कनेक्शन मिला। लाखों लोगों ने स्वेच्छा से गैस सबसिडी छोड़ दी। हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र को राजी किया जा सका, आदि। पर मोदी ने कुछ कड़वी सच्चाइयों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड पाने वाले किसानों की संख्या तो बताई, पर किसानों की खुदकुशी के तथ्य को गोल कर गए। उन्होंने 2022 तक किसानों की आय दुगुनी हो जाने का सपना तो दिखाया, पर यह नहीं बताया कि किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम कब मिलेगा। आखिर यह उनका और उनकी पार्टी का ही वायदा था कि सत्ता में आने पर वे किसानों को उपज का लागत से डेढ़ गुना दाम दिलाएंगे। यह वादा कब पूरा होगा? प्रधानमंत्री ने स्वच्छ और स्वस्थ भारत की दुहाई दी। स्वच्छता अभियान फोटो खिंचवाने-छपवाने के अवसर में बदल गया; स्वास्थ्य के मोर्चे पर क्या हालत है
यह गोरखपुर में आक्सीजन की कमी से हुई बच्चों की मौतों ने बता दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार जहां इस मामले में लीपापोती करने में लगी हुई है, वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कहते हैं कि इतने बड़े देश में यह सब होता रहता है, और प्रधानमंत्री मोदी, जो कहते हैं कि ‘चलता है’ नहीं चलेगा वे भी इस घटना का जिक्र इस तरह करते हैं जैसे यह कोई कुदरती हादसा हो। प्रधानमंत्री ने सही कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान न गाली से होगा न गोली से, बल्कि हर कश्मीरी को गले लगाने से होगा। लेकिन क्या अब तक उनकी सरकार ने इस दिशा में कोई पहल की है? सरकार के अब तक के रवैए से तो यही लगता है मानो कश्मीर मामले में किसी भी पक्ष से कोई बातचीत उसके एजेंडे में है ही नहीं। प्रधानमंत्री की एक और बात को भी कसौटी पर रख कर देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आस्था के नाम पर हिंसा एकदम अस्वीकार्य है। लेकिन क्या कारण है कि उनकी सरकार बनने के बाद ही गोरक्षा के नाम पर झुंड बना कर की जाने वाली हिंसा में तेजी आई? विकास दर को लेकर अर्थशास्त्री उत्साहित नहीं हैं, और हर साल दो करोड़ नए रोजगार देने का वादा पूरा होना तो दूर, पिछले कुछ महीनों में लाखों लोग नौकरी गंवा चुके हैं। क्या यही ‘नए भारत’ के लक्षण हैं?
