यह हैरान करने वाली बात है कि एक ओर कश्मीर में उथल-पुथल से लेकर सीमापार से आतंकी गतिविधियों के चलते भारत और पाकिस्तान के संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है, दूसरी ओर पाकिस्तान की हरकतों से ऐसा लगता है कि वह जान-बूझ कर भारत को उकसाने की कोशिश कर रहा है। सवाल है कि कश्मीर में अशांति के पीछे जिस तरह पाकिस्तान की भूमिका सामने आती रही है, उसमें हाल की हिंसा के बाद उसका वहां सामान आपूर्ति करने का प्रस्ताव भेजना क्या चिढ़ाने वाली कार्रवाई नहीं है! भारत ने उचित ही पाकिस्तान की बेतुकी पेशकश फौरन ठुकरा दी। यही नहीं, पाकिस्तान को उसकी तरफ से होने वाले ‘आतंकवाद के निर्यात’ की याद भी दिलाई। विडंबना यह है कि इस तरह की तमाम फटकार का पाकिस्तान पर मानो कोई असर ही नहीं पड़ता। वैसे ही सीमापार से घुसपैठ, आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा, मादक पदार्थों और जाली मुद्रा की तस्करी की शक्ल में पाकिस्तान बहुत कुछ भेजता रहा है! और यह सब करते हुए जब वह सामान्य जरूरत के सामान की आपूर्ति का संदेश भेजता है तो इससे बेतुका और क्या हो सकता है! हाल ही में सार्क देशों के गृहमंत्रियों की बैठक में भारत के प्रति पाकिस्तान का रुख किस कदर आपत्तिजनक रहा, यह सभी जानते हैं। खुद ही अशांति पैदा करना और स्थिति बिगड़ने पर मदद का हवाला देकर जरूरी सामान भेजने की बात करना उसके दोहरेपन को ही दर्शाता है। कुछ साल पहले उस इलाके में भूकम्प आने के बाद साझा तौर पर राहत-कार्य चलाने की चर्चा चली थी। यह अलग बात है कि दोनों देशों के आपसी रिश्तों में खटास के चलते वैसी साझेदारी नहीं हो सकी थी। लेकिन कश्मीर में फिलहाल न किसी युद्ध की घोषणा है, न वहां कोई प्राकृतिक आपदा आई है कि दूसरे देश सहायता के प्रस्ताव भेजने लगें।
सही है कि बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में उभरी उग्र प्रतिक्रिया से निपटने के क्रम में सरकार ने थोड़ा जरूरत से ज्यादा सख्त रास्ता अख्तियार किया। वहां फैली व्यापक हिंसा में पचास से ज्यादा लोगों की जान चली गई और बहुत सारे लोग बुरी तरह घायल हो गए। खासतौर पर पैलेट गन से जख्मी लोगों की हालत काफी चिंता का मुद्दा बनी। मगर इस सारे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका क्या रही है, यह छिपा नहीं है। कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति को पटरी पर लाना और सामान्य जनजीवन बहाल करना आखिर सरकार की ही जिम्मेदारी है। समस्या तब ज्यादा जटिल हो जाती है जब बिगड़े हालात को ठीक करने के लिए इधर भारत कोशिश कर रहा होता है और उधर पाकिस्तान फिर कोई नई मुसीबत खड़ी करने की कवायद में लगा होता है। यह स्थिति उसके राजनीतिकों या कूटनयिकों की बेलगाम बयानबाजियों से लेकर सीधे-सीधे आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने तक के मामले में बनी हुई है। जब सरकार कश्मीर में स्थिति को सामान्य बनाने में लगी है, तब वहां के लोगों को कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन देने के पीछे पाकिस्तान की मंशा वहां आग को और भड़काने के सिवा और क्या हो सकती है? अच्छा होगा कि पाकिस्तान हर मुद्दे पर कश्मीर राग अलापना बंद करे और आपसी संबंधों को सहज बनाने की दिशा में आगे बढ़े।
