असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की जिंदगी अब भी किसी जुए से कम नहीं। दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें न जाने कहां-कहां भटकना पड़ता है, फिर भी निश्चिंतता कहीं नहीं कि बदहाली से उन्हें मुक्ति मिलेगी ही। ओड़ीशा के कालाहांड़ी के तीन मजदूरों की कहानी इसकी ताजा कड़ी है। वे इस आस में बंगलुरु गए थे कि वहां मेहनत करके कुछ पैसे कमाएंगे और अपने परिवार का पेट भर पाएंगे।
मगर उन्हें लौटना पड़ा खाली हाथ। जिस व्यक्ति ने उन्हें काम पर लगाया था, मजदूरी मांगने पर वह उन्हें मारता-पीटता था। दो महीने काम करने के बाद भी मजदूरी नहीं मिली और जिल्लत मिलती रही, तो उन्होंने घर वापसी का फैसला किया। हाथ में पैसे नहीं थे, खाने को कुछ था नहीं। वे बंगलुरु से खाली हाथ चल पड़े अपने गांव और सात दिन लगातार चलते हुए भूखे-प्यासे अपने घर पहुंचे।
इन मजदूरों की कहानी इसलिए लोगों के सामने आ सकी कि वे पैदल चलते हुए घर पहुंचे। वरना इन जैसे न जाने कितने मजदूर ऐसे हैं, तो हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी मजदूरी को हाथ पसारते-पसारते थक जाते हैं और जिल्लत उठाने को मजबूर होते हैं। इनकी सुनवाई कहीं नहीं होती।
संगठित और सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की कमी और पढ़े-लिखे बेरोजगारों का आंकड़ा तो समय-समय पर सामने आता रहता है, मगर हमारे देश में लाखों ऐसे मजदूरों का कोई ठीक-ठीक हिसाब-किताब नहीं, जो असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करते हैं। वे किसी र्इंट भट्ठे पर, किसी बनती हुई इमारत में, कहीं सड़क पर मिट्टी ढोने वगैरह के काम तलाशते फिरते हैं।
गांवों से बहुत सारे लोग इस उम्मीद में शहरों का रुख करते हैं कि वहां उन्हें गुजारे लायक काम मिल जाएगा। मगर वहां भी उन्हें कम दुश्वारियां नहीं झेलनी पड़तीं। शहरों के हर ‘लेबर चौराहे’ पर सुबह-सुबह मजदूरों का हुजूम खड़ा होता है, मगर उनमें से कुछ को ही काम मिल पाता है। जो ठेकेदार उन्हें काम पर लगाते हैं, उनकी दबंगई ऐसी कि पैसा समय पर कभी नहीं देते, बल्कि मजदूरों का पैसा मारने की फिराक में अधिक रहते हैं।
ऐसे ही ठेकेदार के शोषण का शिकार हुए कालाहांडी के ये तीनों मजदूर। ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई का कोई व्यवस्थित तंत्र कहीं नहीं है, जहां मजदूर सीधे गुहार लगा सकें। वैसे भी गरीब अनपढ़ मजदूर पुलिस के सामने पड़ने से बचते हैं, वे शिकायत करने भला कहां जाते।
मगर इससे भी दारुण कथा यह है कि इन मजदूरों को सरकारें कम नहीं छलतीं। कालाहांडी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। मगर ओड़ीशा सरकार वहां के लोगों के लिए क्या करती है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वहां से लोगों को सैकड़ों मील दूर रोजगार की तलाश में भटकना पड़ता है। किसी परिवार को अपना नवजात शिशु बेच कर पेट भरने का इंतजाम करना पड़ता है।
गरीब परिवारों को सौ दिन के रोजगार की संवैधानिक गारंटी दी गई है। मगर इसके लिए शुरू की गई मनरेगा योजना में पैसे की कमी और अनियमितता के बीच मजदूर पचास दिन का काम और पैसा भी पा जाएं तो वे खुद को खुशकिस्मत समझते हैं। अगर इन श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर ही गुजारे लायक काम मिल जाता, तो उन्हें इस कदर दर-दर तो न भटकना पड़ता। ओड़ीशा सरकार के पास शायद ही इस सवाल का जवाब हो कि क्यों वहां के लोगों को ऐसी जिल्लत उठानी पड़ती है।
