उड़ी में हुए आतंकी हमले में जिस तरह देश के अठारह फौजियों की जान गई, उसे आतंक के स्रोतों के प्रति भारत के जरूरत से ज्यादा उदार रवैये के नतीजे के तौर पर भी देखा गया। मगर इस बार देश भर में जो आक्रोश पैदा हुआ, उसके असर से सरकार खुद को निरपेक्ष नहीं रख सकती थी। इसलिए अगर सुरक्षा के मामले में उच्च स्तरीय बैठकों में इस मसले पर अपनाई जाने वाली रणनीति और कूटनीति में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश से लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच अतीत में किए गए समझौतों पर इसका असर पड़ रहा है तो यह स्वाभाविक है। यही वजह है कि भारत ने 1960 में दोनों देशों के बीच हुए सिंधु जल समझौते से अलग होने के संकेत दिए हैं। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे की मौजूदा व्यवस्था अगर किन्हीं हालात में टूटती है तो इसका पाकिस्तान को व्यापक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि ब्रिटिश सत्ता से आजादी के बाद जब पाकिस्तान के सामने पानी का संकट गहराने लगा और उसे लगा कि युद्ध की स्थिति में उसका पानी रोका जा सकता है, तो उसने भारत से गुहार लगाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी। फिर 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच सिंधु जल समझौता हुआ, जिसके तहत तीन पूर्वी नदियों- व्यास, रावी और सतलुज पर भारत का नियंत्रण है, वहीं तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, चेनाब और झेलम के ज्यादातर पानी पर पाकिस्तान का हक है। पाकिस्तान के सामने समस्या यह है कि उसके अधिकार वाली नदियां भी भारत के जम्मू-कश्मीर से होकर ही वहां जाती हैं। इसके बावजूद समझौते के मुताबिक भारत सिंधु नदी का केवल बीस फीसद पानी इस्तेमाल कर सकता है, जबकि करीब अस्सी फीसद पानी पाकिस्तान को मिलता है। यही वजह है कि इसे दुनिया का सबसे उदार समझौता माना जाता है।
पाकिस्तान की ओर से बार-बार समस्या खड़ी करने से लेकर आतंकवादियों को शह और शरण देने को लेकर भारत में यह मांग अक्सर उठती रही है कि पाकिस्तान को अपने यहां के आतंकी शिविरों को खत्म करने के लिए बाध्य करने के मकसद से सिंधु जल समझौता रद्द कर देना चाहिए। पर इस समझौते के मानवीय पहलू के मद्देनजर कई बार हालात बहुत संवेदनशील और तनावपूर्ण हो जाने के बावजूद भारत ने यह सख्त कदम नहीं उठाया। दरअसल, पाकिस्तान का करीब पैंसठ फीसद भौगोलिक क्षेत्र सिंधु नदी घाटी का हिस्सा है। इस इलाके में सिंचाई, कृषि, ऊर्जा उत्पादन से लेकर पेयजल तक की व्यवस्था का अधिकतर हिस्सा सिंधु पर ही निर्भर है और इस नदी को पाकिस्तान की जीवन रेखा कहा जाता है। यानी अगर इस मसले पर भारत ने कोई सख्त रुख अख्तियार किया और समझौते को रद्द करने का फैसला किया, तो पाकिस्तान के सामने खड़ी होने वाली समस्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। मगर यह समझना मुश्किल है कि इतनी बड़ी निर्भरता होने के बावजूद पाकिस्तान का रवैया इस कदर भारत को परेशान करने वाला क्यों बना हुआ है। ऐसे तथ्य बार-बार सामने आते रहे हैं कि भारत में आतंकवाद की समस्या अगर इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है तो इसके पीछे आतंकियों को पाकिस्तान की ओर से मिलने वाली सहायता और समर्थन है। लेकिन भारत हो या कोई और देश, कब तक अपने खिलाफ ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त कर सकता है।

