सरहद के उस पार से होने वाली गोलीबारी के शिकार नागरिकों को मुआवजा देने का फैसला देर से ही सही, एक दुरुस्त कदम है। आतंकवादी और सांप्रदायिक हिंसा की तरह वे भी ऐसी हिंसा के शिकार होते हैं जिससे उन्हें बचाना राज्य का कर्तव्य है। अप्रैल 2008 से आतंकवादी तथा सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को मुआवजा देने की गृह मंत्रालय की नीति चली आ रही है। पर इस नीति में वे लोग शामिल नहीं थे जो सरहदी इलाके में रहते हैं और जब-तब सीमा की दूसरी तरफ से होने वाली गोलीबारी या बमबारी की चपेट में आ जाते हैं। छिटपुट तौर पर उन्हें या उनके परिजनों को भले मुआवजा मिला हो, लेकिन वे मुआवजा संबंधी चली आ रही नीति के दायरे से बाहर थे। ताजा फैसले के जरिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ी नीतिगत विसंगति दूर कर दी है।
सांप्रदायिक, आतंकी व नक्सली हिंसा में जान गंवाने वालों के परिजनों को तीन लाख रुपए मुआवजे के तौर पर दिए जाते रहे हैं। केंद्र सरकार ने इस राशि को बढ़ा कर अब पांच लाख रुपए कर दिया है। सीमापार से होने वाली गोलीबारी के पीड़ितों को भी मुआवजे के तौर पर इतनी ही रकम मिलेगी। ऐसी घटनाओं के चलते पचास फीसद या अधिक निशक्तता आने पर या असमर्थता की स्थिति में भी पीड़ितों को पांच लाख रुपए दिए जाएंगे। अलबत्ता मुआवजे के साथ यह शर्त जुड़ी हुई है कि मृतक के परिवार के किसी सदस्य को केंद्र या राज्य सरकार की तरफ से रोजगार मुहैया न कराया गया हो। सीमा पर गोलीबारी के पीड़ितों के लिए मुआवजे का निर्धारण इसलिए भी जरूरी था कि ऐसी घटनाओं में नागरिकों के जान गंवाने का सिलसिला बना रहा है। यही नहीं, आंकड़े यह भी बताते हैं कि सुरक्षा बलों की तुलना में आम नागरिक ज्यादा मारे गए हैं।
जम्मू-कश्मीर सरकार ने पिछले महीने विधानसभा में बताया कि वर्ष 2002 से 2015 तक सीमा पर गोलीबारी की 11,272 घटनाएं हुर्इं, जिनमें एक सौ उनहत्तर आम नागरिक मारे गए और सात सौ पैंतीस घायल हुए। इसके बरक्स सुरक्षा बलों की बाबत यह आंकड़ा क्रमश: एक सौ चौवालीस और सात सौ पैंतीस का है। यह फर्क साल-दर-साल के अलग-अलग आंकड़ों में भी दिखता है। यह भी गौरतलब है कि सीमा पर गोलीबारी की सबसे ज्यादा घटनाएं 2002 और 2003 में हुई थीं। नवंबर 2003 में संघर्ष विराम समझौता हुआ, और इसका अच्छा परिणाम देखने को मिला। वर्ष 2004 में ऐसी एक भी घटना नहीं हुई।
इसके बाद भी सात-आठ साल तक शांति रही। लेकिन 2013 में पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम के उल्लंघन की काफी घटनाएं हुर्इं, और यह सिलसिला थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ बना रहा है। ऐसी घटनाओं को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलता रहा है, दोनों तरफ के मीडिया में भी ऐसी घटनाएं सुर्खियों में रहती हैं, उन पर खूब तीखी प्रतिक्रियाएं होती हैं और कई बार तनाव काफी बढ़ जाता है। एक दूसरे को ललकारने और सबक सिखाने के बयान आते हैं। बेशक यह सब दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि ऐसी घटनाओं को रोकने की पहल भी हुई है। सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स के आला अफसरों की कई बार बैठकें हुई हैं और कुछ सहमति भी बनी है। इस सब का एक हद तक सकारात्मक असर ही हुआ है, पर जब तक अपेक्षित नतीजा नहीं आता, सीमा पर निगरानी व सतर्कता बढ़ाने की जरूरत बनी रहेगी
