भारतीय रेलवे ने प्रीमियम ट्रेनों में ‘लचीला’ (फ्लैक्सी) किराया लागू कर मध्यवर्ग के यात्रियों की जेब हल्की करने का इंतजाम कर दिया है। इसे लचीला कहेंगे या खर्चीला? बयालीस राजधानी, छियालीस शताब्दी और चौवन दुरंतो ट्रेनों के एसी फर्स्ट और एक्जीक्यूटिव क्लास को छोड़ बाकी सभी श्रेणियों यानी सेकेंड क्लास, स्लीपर, एसी-थ्री, एसी-टू और चेयरकार के टिकटों के मूल किराए में दस से पचास फीसद तक इजाफा कर दिया गया है। अगर सीधे-सीधे किराया बढ़ने की बात की जाती तो आलोचना के स्वर कुछ ज्यादा ही तीव्र होते। लेकिन यहां तो सरकार यह कह कर अपना पल्ला झाड़ रही है कि उसने हवाई सेवाओं की तर्ज पर एक नई व्यवस्था लागू की है। किराए में बढ़ोतरी बीती रात से लागू हो भी गई। ऐसी तत्परता सरकार ने शायद ही किसी और मामले में दिखाई हो। नई दर के हिसाब से पहली दस फीसद सीटों का किराया यथावत रहेगा। लेकिन इसके बाद हर दस फीसद सीटों में दस-दस फीसद किराया-वृद्धि होगी। 51 फीसद से लेकर 100 फीसद तक सीटों में पचास फीसद का इजाफा होगा। रेलवे बोर्ड के सर्कुलर के मुताबिक तत्काल टिकट भी डेढ़ गुना किराए पर उपलब्ध होगा। दो साल के भीतर यह अब तक की सबसे बड़ी किराया-वृद्धि है। माना जा रहा है कि रेलवे यह कदम माल ढुलाई में कमी की वजह से उठा रहा है। इससे चालू वित्तवर्ष में रेलवे को पांच सौ करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय होगी।

हालांकि रेलवे बोर्ड ने किसी विरोधी-हमले से बचने के लिए कहा है कि फिलहाल इसे परीक्षण के तौर पर अपनाया जा रहा है। तीन-चार महीने बाद इसकी समीक्षा होगी। बोर्ड का यह भी कहना है कि यह प्रणाली दलालों को हतोत्साहित करने के लिए की जा रही है, लेकिन जानकार मान रहे हैं कि इससे तो रेलवे में टिकट बुक कराने वाले दलाल ज्यादा कमाई करेंगे, क्योंकि अब वे ग्राहकों से ज्यादा पैसा वसूलेंगे। अलबत्ता ऊपरी तौर पर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि रेलवे को विमान सेवाओं जैसा बना दिया गया है। अगर सरकार सचमुच रेलवे की तुलना विमान सेवाओं से करना चाहती है तो उसे सबसे पहले ट्रेनो की लेटलतीफी और बदइंतजामी को दूर करना चाहिए था। लेकिन वैसा करने के बजाय उसने यात्रियों की जेब पर हाथ डालने की तत्परता दिखाई है। यह दलील भी सरकार की तरफ से दी जा रही है कि सातवां वेतनमान लागू होने की वजह से केंद्रीय और राज्यकर्मियों के पास पैसा आया है, इसलिए उनसे ज्यादा किराया वसूलने में कोई हर्ज नहीं है। पर इस देश में केंद्र और राज्यों को मिलाकर सरकारी नौकरी करनेवालों की संख्या कुल आबादी के साढ़े चार-पांच फीसद से अधिक नहीं है। जो लोग इस तरह की वेतनवृद्धि से वंचित हैं, उनका खयाल क्यों नहीं रखा गया?

एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इस प्रणाली से रेलवे पर दबाव कम हो जाएगा और लोग हवाई यात्राओं की तरफ ज्यादा रुचि लेंगे। यह कहना भी बेतुका है, क्योंकि देश के ज्यादातर शहर हवाई सेवाओं से जुड़े नहीं हैं। रेलवे का यह भी मानना है कि इससे विलंब से आरक्षण कराने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। यह दलील तो और भी विचित्र है, क्योंकि तमाम यात्री ऐसे होते जिनके यात्रा-कार्यक्रम अचानक बनते हैं या एक-दो दिन पहले ही उन्हें पता चलता है कि कहीं जाना है। दूसरा सवाल यह भी है कि अगर सीटें ही उपलब्ध नहीं होंगी तो कोई कितना भी पहले आरक्षण कराए, उसे बढ़ा किराया देना ही पड़ेगा।
एक कूटनीतिक प्रगति ही मानी जाएगी।