गोवा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर उठी बगावत से संघ की छवि को गहरा धक्का लगा है। यों दलों व संगठनों में मतभेद, कलह और टूट-फूट कोई नई बात नहीं है। पर गोवा प्रकरण को बहुत सारे लोग हैरत भरी निगाह से देख रहे हैं, तो इसकी वजहें जाहिर हैं। आरएसएस पर लोकतांत्रिक न होने तथा संकीर्णता फैलाने के आरोप लगते रहे हैं, पर उसकी साख एक काफी अनुशासित संगठन की रही है। संघ के कार्यकर्ता अपने नेतृत्व के निर्देशों का पालन जिस भक्तिभाव से करते आए हैं उसकी मिसाल दूसरे किसी संगठन में शायद ही मिले। पर गोवा में संघ की यह छवि तार-तार हो गई है। शायद ही किसी अन्य राज्य में संघ के भीतर ऐसी खुली बगावत पहले कभी हुई हो। गोवा प्रकरण में दूसरी उल्लेखनीय बात संघ और भाजपा के रिश्तों से ताल्लुक रखती है।
यह आम धारणा रही है कि संघ और भाजपा के बीच हमेशा सौहार्द का रिश्ता रहता है, आपस में कोई मतभेद या गतिरोध आता भी है तो उसे जल्दी ही मिल-बैठ कर दूर कर लिया जाता है। दोनों के बीच टकराव की कल्पना भी नहीं की जाती। इस धारणा को भी गहरा धक्का लगा है। गोवा में संघ के प्रमुख सुभाष वेलिंगकर से भाजपा इस कदर खफा थी कि उन्हें हटवाए बिना उसे चैन नहीं था। पार्टी की शिकायत या मांग पर संघ के केंद्रीय नेतृत्व ने गोवा की जिम्मेदारी से वेलिंगकर को हटा दिया। यह मान कर चला गया होगा कि वेलिंगकर मन मसोस कर चुप बैठ जाएंगे और धीरे-धीरे उन्हें मना लिया जाएगा। पर वेलिंगकर चुप नहीं बैठे। यही नहीं, उनके पक्ष में संघ के गोवा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने भी बगावत कर दी है और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने का इरादा जताया है।
सुभाष वेलिंगकर बीबीएसएम यानी भारतीय भाषा सुरक्षा मंच नाम से एक अभियान चला रहे थे, वह यह कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को सरकारी अनुदान बंद किया जाए, और प्राथमिक शिक्षा का माध्यम प्रादेशिक भाषाओं को बनाया जाए। क्या संघ यह कह सकता है कि बीबीएसएम की मुहिम उसकी सोच के खिलाफ थी? खुद मनोहर पर्रीकर एक समय बीबीएसएम की मांग की पैरवी करते थे। पर गोवा में सत्ता में आने पर भाजपा के सुर बदल गए, और पर्रीकर से लेकर मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर तक, गोवा के तमाम प्रमुख भाजपा नेताओं से वेलिंगकर के रिश्ते तल्ख होते गए।
यह दिलचस्प है कि भारतीय भाषाओं की वकालत करने वाले संघ ने यह कह कर वेलिंगकर को प्रदेश की जिम्मेदारी से हटाया है कि वे ‘राजनीतिक गतिविधियों’ में लिप्त थे और संघ इसकी इजाजत नहीं दे सकता। भाजपा के उम्मीदवारों और पदाधिकारियों के चयन से लेकर चुनाव में बूथ संभालने तक संघ की भूमिका दुनिया की नजरों से छिपी नहीं है। भाजपा के सत्ता में आने पर सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों में दखलंदाजी करने, मनचाही नियुक्तियां करवाने तथा अपनी मर्जी के पाठ्यक्रम थोपने से संघ बाज नहीं आता। फिर वह औरों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने की सलाह कैसे दे सकता है? भाजपा को नियंत्रित करने के चक्कर में संघ दिनोंदिन राजनीति में और उलझता गया है। इसके फलस्वरूप केंद्रीय या शीर्ष स्तर पर कोई समस्या फिलहाल भले न हो, पर राज्यों में या स्थानीय स्तर पर असंतोष फूटने लगा
