इजराइल के साथ भारत के कूटनीतिक संबंधों की उम्र यों तो पच्चीस साल पुरानी है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे ने रिश्तों का एक नया क्षितिज खोल दिया है। इसका असर दूरगामी और बहुस्तरीय होगा। सत्तर वर्षों में पहली बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री इजराइल गया और पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत हुआ। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तो हर्षातिरेक में यह तक कह गए कि यह रिश्ता स्वर्ग में तय हुआ लेकिन हम इसे धरती पर पूरा कर रहे हैं। राष्ट्रपति रुवन रेवलिन ने प्रोटोकॉल से परे जाकर मोदी की भावभीनी अगवानी की और उन्हें दुनिया के महानतम नेताओं में से एक बताया। बुधवार को दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद और सामरिक खतरों से निपटने समेत जो सात महत्त्वपूर्ण करार किए हैं, उन्हें इस नई बनी नजदीकी की सौगात कहना गलत नहीं होगा। दोनों देश औद्योगिक शोध, जल संरक्षण, अंतरिक्ष कार्यक्रम, कृषि तकनीक आदि में एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। साझा बयान में कहा गया है, ‘हमारा लक्ष्य ऐसा रिश्ता बनाना है जो हमारी साझी प्राथमिकताओं को दिखाए और हमारे लोगों के बीच प्रगाढ़ रिश्ता बनाए।’ मोदी ने कहा कि भारत सीधे तौर पर नफरत और आतंकवाद से पीड़ित है, इसी तरह इजराइल भी है।

नेतन्याहू ने इसका समर्थन करते हुए साफ किया कि दोनों देशों को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की जरूरत है। जहां तक किसी देश की पहली यात्रा का सवाल है तो इसमें कोई खास कोण तलाशना निरर्थक है, क्योंकि अट्ठाईस वर्षों में श्रीलंका और सत्रह वर्षों में नेपाल जाने वाले भी मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। देखने वाली बात यह है कि आज के दौर में दुनिया भर में वैचारिक सीमाएं धुंधली हो रही हैं और कारोबारी-सौदेबाजी वाली व्यावहारिक राजनीति का असर बढ़ा है। मोदी की इस यात्रा में भी यह व्यावहारिकता साफ नजर आ रही है। लेकिन इजराइल के प्रति मोदी के झुकाव की एक और वजह भी है। आतंकवाद को लेकर शुरू से इजराइल का कठोर रुख रहा है और मोदी का रुख भी इस मामले में बेहद कड़ा है। यह अलग बात है कि इजराइल के लिए आतंकवाद का मतलब फिलस्तीन समर्थक कट्टरपंथियों से है, जबकि भारत के लिए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से।

ऐसे में, इजराइल इस मामले में भारत की कितनी मदद करेगा, क्योंकि उसने अरब जगत के कई देशों से अपने संबंध अच्छे कर लिए हैं? चीन के साथ भी इजराइल का संबंध और कारोबार अच्छा है। चीन के साथ इजराइल का कारोबार जहां तेरह अरब डॉलर का है, वहीं भारत के साथ पांच अरब डॉलर का।
रक्षा क्षेत्र में जरूर इजराइल भारत की ज्यादा मदद कर सकता है। 2012 से 2016 के बीच इजराइल के रक्षा सामान की सर्वाधिक, इकतालीस फीसद खरीद भारत ने की है। इजराइल ने 1962 की चीन से जंग में भी भारत की मदद की थी और भारत के आणविक हथियारों से जुड़े कार्यक्रमों में भी मददगार रहा है। लेकिन फिलस्तीन को लेकर भारतीय नजरिए की वजह से इजराइल से एक नपा-तुला रिश्ता ही रहता था। फिलस्तीन समस्या के समाधान के लिए दो-राज्य के सिद्धांत को मान्यता देने के भारत के रुख के बावजूद अगर दोनों देशों ने एक दूसरे की बांह पकड़ कर आगे बढ़ने की शुरुआत की है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि यह परिपक्वता आगे भी बनी रहेगी।