पिछले कुछ समय से वैश्विक राजनीति में जैसी उथल-पुथल मची है, उसमें लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद को छह महीने के लिए नजरबंद करना पाकिस्तान के लिए फिलहाल एक मजबूरी है। वरना यह छिपी बात नहीं है कि हाफिज सईद को लेकर पाकिस्तानी सत्ता का क्या रुख रहा है और उसे कैसे संरक्षण मिलते रहे हैं। पाकिस्तान के इस कदम के पीछे माना जा रहा है कि आतंकवाद को लेकर अमेरिका के सख्त रुख को देखते हुए उसे इस मोर्चे पर कुछ करते हुए दिखना जरूरी है। जाहिर है, पहले की तरह पाकिस्तान का यह कदम आतंकवाद पर काबू पाने में अपनी कोई सार्थक भूमिका निभाने के बजाय तात्कालिक तौर पर ध्यान बंटाने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं है। अमेरिका के नए राष्ट्रपति ने आतंकवाद को लेकर जिस सख्त रुख का संकेत दिया है, उसकी जद में पाकिस्तान भी है।
अमेरिका ने साफ कहा है कि अगर जमात-उद-दावा और हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में समस्या और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। जमात-उद-दावा असल में लश्कर-ए-तैयबा का ही मुखौटा संगठन है। 2008 में मुंबई हमले के लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार माना गया और उस आतंकी वारदात में हाफिज सईद के शामिल होने के तमाम सबूत दिए जाने के बावजूद पाकिस्तान उसे संरक्षण देता रहा है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र ने जून, 2014 में जमात-उद-दावा को भी एक आतंकवादी संगठन घोषित किया था। तो हाफिज सईद को नजरबंद करने के पीछे अगर पाकिस्तान के लिए जारी की गई अमेरिका की चेतावनी हो तो यह इसलिए हैरान होने वाली बात नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान भले भारत की आपत्तियों को दरकिनार करता रहा है, लेकिन अमेरिका के ऐसे रुख का सामना करना उसके लिए आसान नहीं है। हालांकि ऐसी भी खबरें हैं कि पाकिस्तान के ही सिंध और पंजाब में मौजूद आतंकवादियों ने हाफिज सईद की हत्या की योजना बनाई है और इसी से बचाने के लिए पाकिस्तान ने नजरबंदी के बहाने उसे सुरक्षा दी है!
इससे पहले भी पाकिस्तान में हाफिज सईद को नजरबंद किया गया था और उसकी अगुआई में चल रहे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की गई। 2001 में भारत में संसद पर हमले, 2006 में मुंबई में ट्रेन बम विस्फोटों और मुंबई में आतंकवादी हमलों के बाद भी उसे गिरफ्तार किया गया था। लेकिन इन सभी मामलों में किसी न किसी बहाने उसे आजादी मिल गई। जबकि सभी जानते हैं कि आतंकी गतिविधियों में हाफिज की कैसी संलिप्तता रही है और कैसे वह अपने भाषणों में भारत के खिलाफ जहर उलगता रहा है। कश्मीर में आज अगर हालात पर काबू पाना मुश्किल बना हुआ है तो इसके पीछे हाफिज का भी बड़ा हाथ है। पिछले साल जुलाई में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर में जो विरोध-प्रदर्शन हुए, उन्हें भड़काने में सईद ने कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन मुश्किल यह है कि इन तथ्यों के बावजूद पाकिस्तान हाफिज सईद केंहंगामे का चलन
विधायिका में बहस-मुबाहिसे के बजाय हंगामे का चलन पिछले कुछ सालों में बढ़ गया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष का तोड़फोड़ पर उतर आना इसका ताजा उदाहरण है। इसके पहले भी वहां कई बार ऐसी घटनाएं हुई हैं। कुछ मौकों पर सत्ता पक्ष के अड़ियल रवैए की वजह से विपक्ष नाराज हुआ तो कुछ मौकों पर विपक्ष खुद किन्हीं मसलों को बेवजह तूल देता रहा। इस बार विपक्ष मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से अनुच्छेद 370 पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग पर अड़ा हुआ था। दरअसल, पांच दिन पहले महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि अगर कोई अनुच्छेद 370 को कमजोर करने की कोशिश करता है तो वह सबसे बड़ा देशद्रोही कदम होगा। यह ऐसा मामला नहीं था, जिस पर सत्तापक्ष को अपना रुख साफ करने में हिचक होनी चाहिए। मगर वहां के शिक्षामंत्री ने विपक्ष की मांग को बेवजह करार देते हुए इस पर किसी तरह की बहस को खारिज कर दिया, तो विपक्ष ने उग्र रूप अख्तियार कर लिया। उन्होंने फाइलें और कुर्सियां उठा कर फेंकना शुरू कर दिया।
यह प्रवृत्ति केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है। विभिन्न विधानसभाओं में ऐसी घटनाएं देखी जा चुकी हैं। कई बार पक्ष और विपक्ष की झड़पों में कुछ जनप्रतिनिधियों के घायल हो जाने के भी उदाहरण हैं। संसद और विधानसभाएं समस्याओं को विचार-विमर्श और आपसी सहयोग से सुलझाने का मंच हैं। मगर अब इनकी कार्यवाहियों में राजनीतिक आग्रह-दुराग्रह ज्यादा हावी रहने लगे हैं। विपक्ष प्राय: सत्ता पक्ष को झुकाने के मकसद से कार्यवाही में बाधा डालने का प्रयास करता देखा जाता है, तो कई बार सत्तापक्ष जानबूझ कर ऐसी स्थिति पैदा करता है कि सदन में हंगामा हो और वह अपने कुछ फैसले मंत्रिमंडल में पारित करा सके। इस तरह अनेक मुद्दों पर बिना किसी बहस के, इकतरफा फैसला हो जाया करता है। यह किसी भी तरह से लोकतांत्रिक तरीका नहीं माना जा सकता।
वैसे सदन में हंगामे की स्थिति पैदा न हो, कामकाज सुचारु रूप से चले और बहस-मुबाहिसे के जरिए मसलों पर कोई फैसला करने की स्थिति बन सके, ऐसा माहौल बनाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है। इसलिए उससे अपेक्षा की जाती है कि अड़ियल रुख अपनाने के बजाय, सभी दलों की राय जानने का प्रयास करे। ऐसे में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामे की स्थिति बनी तो उसके लिए सिर्फ विपक्ष को दोष नहीं दिया जा सकता। अनुच्छेद 370 कश्मीरियों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। अगर उसे लेकर मुख्यमंत्री ने कुछ कहा, तो उसे सदन में स्पष्ट करने से परहेज क्यों होना चाहिए था। जब से वहां भाजपा के सहयोग से पीडीपी ने सरकार बनाई है, अनुच्छेद 370 को लेकर लोगों के मन में संशय रहता है, क्योंकि भाजपा इसे समाप्त करने की वकालत करती रही है। इसलिए मुख्यमंत्री से सदन में अपनी बात स्पष्ट करने की विपक्ष की मांग अनुचित नहीं मानी जा सकती। मगर जिस तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के सदस्यों ने सदन की मर्यादा का खयाल न करते हुए तोड़-फोड़ की वह अपनी मांग मनवाने का लोकतांत्रिक तरीका नहीं कहा जा सकता। यह महज सस्ती लोकप्रियता बटोरने का रास्ता हो सकता है। दरअसल, जब से मीडिया का प्रसार बढ़ा है और सदन की कार्यवाही के हर पल की खबरें लोगों तक पहुंचने लगी हैं, कुछ जनप्रतिनिधि तल्ख तेवर अपना कर जाहिर करने की कोशिश करते हैं कि वे अपने लोगों की फिक्र करते हैं। मगर ऐसी हरकतों से जो सदन के कामकाज में बाधा पहुंचती और मर्यादा का उल्लंघन होता है, उसकी भरपाई नहीं हो पाती।