यह निश्चय ही जनतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है। एक मई से किसी भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती नहीं होगी। लाल बत्ती लगी गाड़ी हमारे देश में ‘वीआइपी कल्चर’ का प्रतीक बन गई थी। यों कोई व्यवस्था कितनी भी जनतांत्रिक और समतावादी हो, कुछ शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएं भी मिली होती हैं। इसका आमतौर पर बुरा नहीं माना जाता। लेकिन हुआ यह कि सातवें दशक से मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढ़ने लगा और लाल बत्ती लगी गाड़ियों का दायरा भी। बहुत सारे मामलों में सत्ता में होने का फायदा उठा कर नियमों में बदलाव करके गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने की छूट बढ़ाई गई। जाहिर है, यह सत्ता के दुरुपयोग का ही एक उदाहरण था। यह भी हुआ कि बहुत सारे वैसे लोग भी लाल बत्ती लगी गाड़ी लेकर घूमने लगे जो इसके लिए कतई अधिकृत नहीं थे। होते-होते लाल बत्ती वाली गाड़ी हमारे देश में एक खास मनोवृत्ति और वीवीआइपी संस्कृति को प्रतिबिंबित करने का जरिया बन गई। अपने रुतबे का प्रदर्शन और सत्ता के गलियारे में पहुंच होने का दिखावा। अपने को अत्यंत विशिष्ट और आम लोगों से ऊपर मानने का दंभ। पद का आडंबर और तामझाम।
लाल बत्ती इन सब चीजों का प्रतीक बनते जाने के साथ ही लोगों के मन में खौफ भी पैदा करने लगी। कहना गलत नहीं होगा कि यह व्यवस्था और नागरिकों के बीच बढ़ती गई खाई का प्रतीक बन गई और लोगों में इसके प्रति भय के साथ-साथ नाराजगी का भी भाव घर कर गया। दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने गाड़ी पर लाल बत्ती के गैर-जरूरी उपयोग पर नाराजगी जताते हुए इसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और प्रधान न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों तक सीमित रखने की हिदायत दी थी। पर राजनीतिक पहल की, सबसे पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने, जब 2014 में वह पहली बार चुन कर आई। पिछले महीने पंजाब की अमरिंदर सिंह सरकार ने भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। इसके बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी वही किया। अब केंद्र सरकार के फैसले के बाद एक मई से बड़े अधिकारी और मंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और प्रधान न्यायाधीश भी लालबत्ती का इस्तेमाल नहीं करेंगे। सिर्फ एंबुलेंस और अग्निशमन जैसी आपात सेवाओं से जुड़ी गाड़ियों को नीली बत्ती लगाने की छूट होगी। गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने की छूट जिस मोटरवाहन अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकारें देती रहीं, उसमें संशोधन करने की भी तैयारी कर ली गई है।
मई दिवस से लागू हो रहे इस फैसले का राजनीतिक संदेश साफ है, कि सरकार वीआइपी संस्कृति से दूर, और आम लोगों के करीब दिखना चाहती है। यह स्वागत-योग्य है। पर यह नेक मंशा लाल बत्ती के प्रतीक तक सीमित क्यों रहे! विशिष्ट की श्रेणी में आने वाले लोगों की सुरक्षा पर भारी खर्च और बेकार का तामझाम भी ऐसा मसला है जिस पर सरकार को ठोस पहल करनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में भी कई बार सख्त टिप्पणी कर चुका है। एक तरफ कई राज्यों में पुलिस के हजारों पद खाली हैं और दूसरी तरफ उपलब्ध पुलिस बल का भी एक खासा हिस्सा वीआइपी सेवा में लगा दिया जाता है। इसका सामान्य कानून-व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस तरफ भी ध्यान देगी।

