आखिरकार लोकपाल की नियुक्ति के मामले में सर्वोच्च अदालत के कठोर रुख ने सरकार की हीलाहवाली की हवा निकाल दी है। अदालत ने फैसला सुनाया है कि लोकपाल अधिनियम में बिना किसी संशोधन के ही काम किया जा सकता है। दरअसल, अदालत इस बात से नाराज थी कि लोकपाल की नियुक्ति को क्यों अधर में रखा गया है। गौरतलब है कि लोकपाल की नियुक्ति में देरी को लेकर स्वयंसेवी संगठन कॉमन कॉज ने याचिका दायर कर रखी थी। देरी का कारण सरकार यह बताती रही कि नियुक्ति समिति की शर्त पूरी नहीं हो पा रही है। लोकपाल की नियुक्ति या चयन के लिए जो समिति गठित की जानी है उसके सदस्यों में लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष का भी प्रावधान है, जबकि मौजूदा लोकसभा में कोई नेता-प्रतिपक्ष नहीं है। कांग्रेस चौवालीस सदस्यों के साथ लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी जरूर है, पर सदन में उसके नेता मल्लिकार्जुन खरगे नेता-प्रतिपक्ष नहीं हैं। उन्हें नेता-प्रतिपक्ष मानने की कांग्रेस की अपील लोकसभा अध्यक्ष ने खारिज कर दी थी। लेकिन केंद्र सरकार के इस तर्क या स्पष्टीकरण से सर्वोच्च न्यायालय संतुष्ट नहीं था।
कोई चार महीने पहले ही सुनवाई के दौरान उसने कहा था कि अगर नेता-प्रतिपक्ष से संबंधित समस्या दूर नहीं हो रही है तो न्यायालय आदेश दे सकता है कि संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता ही नेता-प्रतिपक्ष होगा। और अब तो न्यायालय ने यह तक कह दिया कि लोकपाल अधिनियम में बिना संशोधन के ही काम किया जा सकता है। दरअसल, अगर सरकार का इरादा टालमटोल का न होता, तो नेता-प्रतिपक्ष की परिभाषा में ढील देने के लिए आवश्यक संशोधन कब का पारित हो चुका होता। अगर इस मामले में कोई संशोधन विधेयक लाया जाता, तो विपक्ष उसका तहेदिल से स्वागत ही करता। पर जो कानून 2013 में पारित हो चुका और जिसे भाजपा ने भी दोनों सदनों में अपना पूरा समर्थन दिया था, उस कानून को लागू करने के बजाय मोदी सरकार ने उसमें एक-दो नहीं, बीस संशोधन प्रस्तावित कर दिए। यह मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात सरकार के उस रवैए की याद दिलाता है जिसने कोई न कोई पेच लगा कर सात साल तक लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने दी थी।
सवाल है कि जब सीबीआइ के निदेशक की नियुक्ति के लिए सीबीआइ अधिनियम में (लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को ही नेता-प्रतिपक्ष मानने के लिए) संशोधन आसानी से हो गया, तो लोकपाल की बाबत ऐसा क्यों नहीं हो सका? सरकार लोकपाल अधिनियम के एक प्रावधान का हवाला दोहराती रही। यह तर्क था या बहाना? जिस सरकार ने अध्याधेश की झड़ी लगाने में संकोच नहीं किया, जिस पर राष्ट्रपति ने भी नाराजगी जताई थी, और जिस सरकार ने गैर-वित्तीय मामलों के विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश करने की ढिठाई दिखाई, वह लोकपाल की नियुक्ति क्या बस इसलिए नहीं कर पा रही थी कि नेता-प्रतिपक्ष की परिभाषा आड़े आ गई? जीएसटी विधेयक पास हो गया, जिसमें अड़ंगेबाजी की तोहमत सरकार विपक्ष पर मढ़ती रही, मगर क्या विडंबना है कि जिस संशोधन के लिए विपक्ष तैयार बैठा था, वह संसदीय समिति के बहाने अब तक अटका रहा है! जबकि इस सरकार को तीन साल होने को हैं। जो सरकार भ्रष्टाचार मिटाने का दम भरती हो, उसे तो लोकपाल की नियुक्ति के लिए तत्पर दिखना चाहिए था। देर से ही सही, अब उसे दुरुस्त कदम उठाना होगा।
