पाकिस्तान ने कथित जासूसी के आरोप में पकड़े गए भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को मौत की सजा मुकर्रर की तभी यह साफ हो गया था कि इस मामले को उसने भारत से अपनी दुश्मनी निकालने का एक और जरिया बना लिया है। खबर आने पर भारत ने लगातार पाकिस्तान को जाधव की फांसी रोकने के लिए समझाने की कोशिश की। पर जैसी कि आशंका थी, पाकिस्तान को भारत की कोई बात सुनना जरूरी नहीं लगा और उसने मौत की सजा को अंतिम रूप देने की ओर कदम बढ़ा दिए थे। जाहिर है, इसके पीछे कोई कानूनी या तकनीकी बाध्यता कम, भारत के प्रति दुराग्रह ज्यादा था। लेकिन इस बीच भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक स्तर पर बातचीत करना जारी रखा। इसी का एक सकारात्मक नतीजा मंगलवार को सामने आया जब नीदरलैंड के हेग स्थित आइसीजे यानी अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत ने कुलभूषण जाधव की फांसी पर फिलहाल रोक लगा दी। हालांकि यह एक तात्कालिक राहत है और अब देखना है कि पंद्रह मई की सुनवाई में यह अदालत क्या रुख अपनाती है। फिर भी पाकिस्तान की ओर से जाधव को फांसी के मसले पर जैसी हड़बड़ी मचाई जा रही थी, उसमें भारत को मिली इस कामयाबी को एक अहम कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है।

दरअसल, इससे पहले भारत ने कम से कम सोलह बार कुलभूषण जाधव को कानूनी मदद मुहैया कराने की मांग की, लेकिन पाकिस्तान ने उसकी मंजूरी नहीं दी। उसका दावा है कि कुलभूषण जाधव भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ का एजेंट है और पाकिस्तान में जासूसी कर रहा था। जबकि भारत की ओर से साफ कहा गया कि जाधव पर विध्वंसकारी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप बेबुनियाद हैं। जाधव नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद व्यवसाय कर रहे थे। उन्हें ईरान से गिरफ्तार करके प्रताड़ित किया जा रहा है। भारत ने पाकिस्तान पर राजनयिक संबंधों पर विएना संधि के ‘भीषण’ उल्लंघन का आरोप लगाया था। आइसीजे ने जाधव को फांसी की सजा की तामील पर रोक के लिए इन्हीं दलीलों को आधार माना है। हालांकि पाकिस्तान के रवैए को देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि वह बिना किसी ठोस दबाव के इस मसले पर गंभीरता से विचार करने के लिए तैयार होगा।

मसलन, आइसीजे के रुख के बाद भी पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें कुलभूषण जाधव को फांसी पर रोक से संबंधित किसी की कोई चिट्ठी नहीं मिली है और कोई भी पत्र जारी करने से पहले आइसीजे को दूसरे पक्ष की बात भी सुननी होगी। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वहां भारतीय दूतावास के लोगों तक को जाधव से मिलने नहीं दिया गया। स्वाभाविक ही यह शक पैदा हुआ है कि कुलभूषण जाधव को मौत की सजा तय करने से पहले कोई सुनवाई हुई भी है या नहीं! आमतौर पर अगर किसी पर जासूस होने का आरोप लगाया जाता है तो उसकी एक प्रक्रिया होती है, उसे अवांछित व्यक्ति घोषित किया जाता है और संबंधित देश को उसे वापस बुलाने के लिए कहा जाता है। भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार ऐसी स्थितियां आ चुकी हैं। लेकिन अगर नियम-कायदों और नैतिक तकाजों को ताक पर रख कर पाकिस्तान अपनी जिद पर अड़ा रहता है तो निश्चित रूप से भारत के एक पड़ोसी के रूप में भविष्य की बहुत सारी संभावनाएं खत्म होंगी।