पिछले एक साल के दौरान नोटबंदी और जीएसटी जैसे जो बड़े फैसले हुए, उनका सीधा असर लोगों के आर्थिक लेन-देन पर दिखा। बाजार में आम उपभोक्ता वस्तुओं सहित तमाम क्षेत्रों में खरीद-बिक्री के मामले में बड़ी गिरावट को लेकर चिंता जाहिर की गई। लेकिन सबसे बड़े नुकसान वाले क्षेत्रों में रियल एस्टेट के कारोबार को देखा गया, जिसमें खासतौर पर बड़े शहरों में नए बने मकानों की खरीद-बिक्री में काफी कमी दर्ज की गई। अब एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई से सितंबर की तिमाही के दौरान देश के नौ प्रमुख शहरों में मकानों की बिक्री में अठारह प्रतिशत की कमी आई। जाहिर है, जैसा कि पिछले कुछ समय से कई आकलनों में कहा जा रहा था, संपत्ति बाजार में घरों की मांग में काफी सुस्ती इस गिरावट की मुख्य वजह है। यों कमोबेश यह असर देश के ज्यादातर शहरों में दर्ज किया गया, लेकिन खासतौर पर सात शहरों पुणे, नोएडा, बंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और अमदाबाद में घरों की बिक्री और नई पेशकश, दोनों स्तरों पर बड़ी गिरावट आई।

हालांकि देश की आर्थिक राजधानी के तौर पर मशहूर मुंबई के अलावा गुरुग्राम में इस मांग और आपूर्ति, दोनों में बढ़ोतरी हुई। लेकिन उसे उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता। दरअसल, नए रीयल एस्टेट (नियमन और विकास) कानून और जीएसटी की नई व्यवस्था के बाद दूसरी तिमाही में जहां कम संख्या में नए मकान खरीदारी के लिए उपलब्ध हुए, वहीं बिक्री भी काफी कम हुई। लेकिन एक तरह से अघोषित मंदी की मार के बीच त्योहारी मौसम के लिए छूट और रियायतों की पेशकश के बाद हालात में कुछ सुधार हुए और सितंबर महीने में घरों की बिक्री थोड़ी बढ़ी। हो सकता है कि बढ़ोतरी के इस आंकड़े को उत्साह बढ़ाने के लिए पेश किया जाए, लेकिन पिछले करीब एक साल से लगातार इस क्षेत्र में जिस तरह की मंदी देखी जा रही है, उसमें कुछ खास स्थितियों में हुए मामूली सकारात्मक फेरबदल को देश की समूची अर्थव्यवस्था के लिहाज से संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है।

गौरतलब है कि हालात में सुधार की जो तस्वीर सामने आई भी है, वह पच्चीस लाख से कम कीमत के घरों की खरीदारी के मामले में है। उसकी वजह भी यह है कि इस श्रेणी में सरकार की ओर से कुछ सुविधाएं दी गर्इं और सस्ती दरों पर कर्ज उपलब्ध कराया गया। लेकिन अर्थव्यवस्था की बुनियाद जिन कारकों पर खड़ी होती है, उनमें इस आवास वर्ग के बाजार के आंकड़े बहुत मददगार साबित नहीं हो सकते। इसके बरक्स हाल में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें कई आवास परियोजनाओं में काफी देरी हो रही है। इसमें पहले ही रकम का पूरा या काफी हिस्सा चुका देने और लंबे समय के इंतजार के बावजूद घर हासिल करने में नाकाम लोग अब अदालत की शरण लेने लगे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि नोटबंदी का फैसला लागू होने के बाद से संपत्ति बाजार की गति काफी धीमी बनी हुई है और रियल एस्टेट क्षेत्र संकटपूर्ण दौर से गुजर रहा है।