छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में मंगलवार को सुरक्षा बलों पर बड़ा हमला कर माओवादियों ने एक बार फिर अपनी मौजूदगी का संदेश देने की कोशिश की है। इस हमले में सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की कोबरा बटालियन के नौ कमांडो शहीद हो गए। हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार दावा करती रही है कि माओवादी दस्ते अब खात्मे की ओर हैं और सीमित इलाके में घिर चुके हैं। लेकिन माओवादियों ने जिस तरह सुरक्षा बलों को निशाना बनाया है, उससे यही लग रहा है कि वे कमजोर नहीं पड़े हैं। उनका खुफिया तंत्र अभी भी इस स्थिति में है कि सुरक्षा बलों की गतिविधियों के बारे में उन्हें पल-पल की जानकारी मिल रही है। इसके ठीक उलट सुकमा का हमला माओवादियों के खिलाफ अभियान में लगे सुरक्षा बलों और पुलिस के खुफिया तंत्र की नाकामी को भी उजागर करता है। हमलावरों को पता था कि सुरक्षा बल किस वाहन में सवार हैं और कहां से गुजरेंगे। साफ है कि चूक और लापरवाही हमारे तंत्र में भी है। डेढ़ दशक पहले तक नक्सली बस्तर के इलाके तक सीमित थे, लेकिन पिछले चौदह सालों में जिस तरह इनका दायरा बढ़ा है, उससे लगता है कि प्रदेश सरकार इस समस्या से निपटने में नाकाम साबित हुई है।

इस साल की शुरुआत में छत्तीसगढ़ में अभियान की कमान संभालने वाले पुलिस महानिदेशक ने बस्तर को जल्द ही माओवादी हिंसा से मुक्त कर देने की बात कही थी। लेकिन चौबीस जनवरी को माओवादियों ने नारायणपुर में हमला कर चार जवानों को मार डाला था। उसके बाद अभी चार दिन पहले ही दंतेवाड़ा में मुख्यमंत्री ने अगले पांच साल में प्रदेश को नक्सल मुक्त कर देने का दावा किया। अब सुकमा हमले ने उनके इस दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है। एक साल में यह पांचवां बड़ा हमला है। पिछले साल सुकमा जिले में ही एक महीने के भीतर दो बड़े हमले कर माओवादियों ने छत्तीस जवानों को मार डाला था। इससे पता चलता है कि चुनौती से निपटने के मामले में सरकार शायद पंगु हो चुकी है। सुकमा हमले के बाद केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने भी माना कि माओवादियों से निपटने के लिए हमारे जवानों को अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है। सरकार सुरक्षा बलों को नए साजो-सामान से लैस करना चाहती है। जाहिर है, कहीं न कहीं सुरक्षा बलों के पास जरूरी हथियार और प्रशिक्षण की कमी है, जिसकी वजह से माओवादी आसानी से हमलों को अंजाम दे जाते हैं।

माओवादी हिंसा से प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों के जवानों के समक्ष सबसे बड़ा खतरा बारूदी सुरंगों का है। सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए अक्सर बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि 2005 से नक्सल प्रभावित राज्यों को ऐसे बख्तरबंद वाहन मुहैया कराए गए हैं जो बारूदी सुरंगों के हमलों को झेल पाने में सक्षम हों। लेकिन माओवादी अब ज्यादा भारी आइईडी बना कर हमले कर रहे हैं। ताजा हमले में पता चला है कि उन्होंने वाहनों को उड़ाने के लिए जो आइईडी तैयार किया था उसमें अस्सी किलो विस्फोटक था। जाहिर है, सुरक्षा बलों के लिए यह बड़ी चुनौती है। सरकार भी इस तथ्य को जानती और मानती है कि माओवादियों के खात्मे के लिए सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियारों और मजबूत खुफिया तंत्र की दरकार है। सवाल यह है कि फिर सरकार नीतिगत स्तर पर कड़े फैसले क्यों नहीं कर पा रही है! समस्या से निपटने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद आज भी जवानों पर हमले और उनके शहीद होने का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा है?