आम आदमी पार्टी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल पर उनकी ही पार्टी के एक मंत्री रह चुके सदस्य ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। यह हैरानी की बात है कि केजरीवाल इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। मंगलवार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया तो उम्मीद बनी कि वे उसमें कोई सफाई देंगे। मगर वहां सिर्फ यह साबित किया गया कि वोटिंग मशीन में गड़बड़ी संभव है और ऐसा बहुत आसानी से किया जा सकता है। समझना मुश्किल है कि वोटिंग मशीन में गड़बड़ी के लिए विशेष सत्र बुलाने की क्या जरूरत थी। इसे निर्वाचन आयोग के सामने भी सिद्ध किया जा सकता था। अब निर्वाचन आयोग ने कह दिया है कि बाजार से खरीद कर लाई गई किसी मशीन में गड़बड़ी करके यह साबित नहीं किया जा सकता कि चुनावों में मतदान के समय धांधली हुई है। उसने आम आदमी पार्टी की सारी कसरत पर पानी फेर दिया।

इस समय लोग जानना चाहते हैं कि पूर्व जल एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्र ने अरविंद केजरीवाल पर जो भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता के आरोप लगाए हैं, उनमें कितनी सच्चाई है। सीबीआई ने कपिल मिश्र की शिकायत दर्ज कर ली है और उसने जांच का मन बना लिया है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल की चुप्पी रहस्यमय जान पड़ती है। वोटिंग मशीन में गड़बड़ी को लेकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी पहले से रही होगी, पर इससे दो दिन पहले कपिल मिश्र ने केजरीवाल पर घूसखोरी का आरोप लगा दिया। इसलिए अरविंद केजरीवाल ने तय कार्यक्रम के मुताबिक विधानसभा के विशेष सत्र का संचालन होने दिया। मगर भ्रष्टाचार के आरोप पर इस तरह चुप्पी साधे रखने से उनके प्रति शक और गहरा होता गया है। संभव है, वे जांच एजेंसियों के सामने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर सफाई देना चाहते हों, ताकि उनका पक्ष आधिकारिक रूप से दर्ज हो और बयानबाजियों के शोर में उनकी बातें कहीं हल्की न पड़ जाएं। पर अभी तक इस मामले में जो भी बयान आए हैं, वे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की तरफ से बहुत संक्षेप में आए हैं। उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि केजरीवाल पर लगे आरोपों को लेकर पार्टी या फिर खुद उनका क्या रुख है। यह ऐसा मामला नहीं है, जिसे नजरअंदाज किया जा सके।

अरविंद केजरीवाल राजनीतिक शुचिता और पारदर्शिता की वकालत करते रहे हैं। अब वे मुख्यमंत्री के जिम्मेदार पद का निर्वाह कर रहे हैं, उनसे अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में सफाई की उम्मीद स्वाभाविक है। जितना वे अपनी चुप्पी को रहस्यमय बनाए रखेंगे, उन पर शक गहराता जाएगा और इस तरह विपक्षी दलों को उन पर हमला करने का मौका मिलता रहेगा। पहले ही उनकी कार्यशैली और एकाधिकारवादी तरीके से पार्टी चलाने के रवैए को लेकर कई सदस्य नाराज हैं। पंजाब और गोवा विधानसभाओं तथा दिल्ली नगर निगम के चुनाव में मिली करारी हार के बाद जिस तरह साबित हो गया है कि पार्टी का जनाधार काफी कमजोर हो गया है, उससे बहुत सारे सदस्यों में निराशा है। इस्तीफों का दौर थम नहीं रहा। ऐसे में पार्टी को मजबूती से संभालने और सदस्यों को धीरज दिलाने की जरूरत होती है, मगर केजरीवाल अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद जैसे अपनी खोल में सिमट गए हैं। उन्हें सार्वजनिक रूप से सफाई देने से क्यों परहेज होना चाहिए! इस तरह पार्टी को बिखरने से रोकना और मुश्किल होगा।