राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हरिद्वार से उन्नाव तक गंगा तट से पांच सौ मीटर की दूरी तक कचरा डालने पर पचास हजार रुपए का जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। एनजीटी ने गुरुवार को दिए एक विस्तृत फैसले में केंद्र सरकार को भी निर्देश दिया कि वह गंगा सफाई अभियान पर अब और पैसा खर्च न करे। यह फैसला केंद्र और राज्य सरकारों के कामकाज पर भी सवालिया निशान लगाता है। मगर फैसले का त्रासद पहलू यह भी है कि सुनवाई पूरी होने में इकतीस साल से ज्यादा का वक्त लग गया। अब क्रियान्वयन पर कितना वक्त लगेगा? देश में नदियों की बदहाली को लेकर मुद्दा लंबे समय से जेरे-बहस है। लेकिन जिस ईमानदारी और विश्वसनीयता से कार्य होना चाहिए था, वह कहीं दिखाई नहीं देता। सरकारें गंगा को लेकर चिंतातुर भले दिखती हों, मगर हकीकत यह है कि गंगा की सफाई को लेकर जितनी राशि पिछले तीन दशक में खर्च की गई है वह अपने आप में भ्रष्टाचार की एक अलग ही कहानी है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आखिरकार एनजीटी को खर्च रोक देने का आदेश देना पड़ा है।

एनजीटी ने हरिद्वार से उन्नाव तक सौ मीटर की दूरी को ‘नो-डेवलपमेंट जोन’ घोषित करते हुए पांच सौ मीटर की दूरी तक कचरा वगैरह डालने की मनाही की है। यह लंबाई करीब पांच सौ किलोमीटर है। कचरा फेंकने वाले को पचास हजार रुपए का जुर्माना देना होगा। अधिकरण ने इसके लिए एक निगरानी समिति का गठन किया है। हरिद्वार उत्तराखंड में और उन्नाव उत्तर प्रदेश में है। दोनों सरकारों से कहा गया है कि वे दो साल के अंदर जलमल शोधन संयंत्र लगा लें तथा जलमल निकासी की समुचित व्यवस्था कर लें। साथ ही छह महीने के भीतर जाजमऊ के चमड़ा कारखानों को उन्नाव या कहीं दूसरी जगह स्थानांतरित करने के लिए भी कहा गया है। याचिकाकर्ता ने 1985 में यह अपील दाखिल की थी, जिसे 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी को सुनवाई के लिए भेज दिया था। एनजीटी ने याचिकाकर्ता की सीबीआई या कैग से जांच की मांग पर कुछ नहीं कहा, लेकिन माना कि इस पर अब तक सात हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो चुका है।

असल में गंगा सफाई का काम सबसे पहले राजीव गांधी के कार्यकाल में करीब नौ सौ करोड़ रुपए के बजट से ‘गंगा कार्य योजना’ नाम से शुरू हुआ था। मौजूदा केंद्र सरकार ‘नमामि गंगे’ नामक एक विस्तृत परियोजना चला रही है, जिसका बजट बीस हजार करोड़ रुपए रखा गया है। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई नाम से अब एक अलग मंत्रालय है। मगर, गंगा सफाई की वास्तविकता क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। एनजीटी का फैसला सरकारों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अगर अब भी सरकारों की आंख खुल जाए और वे पारदर्शिता व जिम्मेदारी के साथ गंगा सफाई अभियान को सफल बनाने में जुट जाएं तो देर से ही सही एक महत्त्वाकांक्षी योजना को साकार किया जा सकता है। आखिरकार गंगा की सफाई का मामला करोड़ों लोगों के जीवन, रोजगार और आस्था से भी जुड़ा है।