राष्ट्रपति पद के चुनाव में नतीजा वैसा ही आया कि जैसा कि आम अनुमान था। वोटों के गणित को देखते हुए राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की जीत तय मानी जा रही थी। मतगणना पूरी होते ही वे विजयी घोषित किए गए और इस तरह भारत के चौदहवें राष्ट्रपति के रूप में उनके पद-ग्रहण का रास्ता साफ हो गया है। राष्ट्रपति चुनाव में क्या होगा, क्या सत्तापक्ष अपना मनचाहा उम्मीदवार जिता सकेगा, इस बारे में करीब चार महीने पहले तक संशय की स्थिति थी। लेकिन कुछ राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पलड़ा साफ तौर पर भाजपा के पक्ष में झुका दिया। अपने सहयोगियों के साथ मिल कर राज्य की तीन सौ पच्चीस सीटें हासिल कर भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में तो वर्चस्व कायम किया ही, राष्ट्रपति चुनाव की कुंजी भी उसके हाथ में आ गई। फिर बड़ी होशियारी से बनाई गई उसकी रणनीति भी इस चुनाव में प्रतिबिंबित हुई है। विपक्ष जानता था कि उसकी तरफ से कोई भी उम्मीदवार हो, जीत सत्तापक्ष की ही होगी। पर विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव को 2019 की चुनौती के मद््देनजर विपक्षी एकजुटता के एक अवसर में बदलना चाहता था। इसमें वह कामयाब नहीं हो सका।
यों मीरा कुमार को सत्रह विपक्षी दलों का समर्थन हासिल था, पर खासकर नीतीश कुमार के साथ न देने से विपक्षी एकजुटता के मंसूबे को गहरा झटका लगा। नीतीश की पार्टी यानी जनता दल (यू) उस गठबंधन का हिस्सा है जिसमें राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस भी शामिल हैं। लेकिन जद (यू) का समर्थन मीरा कुमार को नहीं, रामनाथ कोविंद को था। फिर उत्तर प्रदेश, गोवा, दिल्ली, बंगाल जैसे कई राज्यों में हुई क्रॉस वोटिंग ने भी विपक्ष की कमजोरी ही उजागर की है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पिता-पुत्र के दो धड़ों में बंटी हुई है, तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कई विधायक पार्टी-नेतृत्व से नाराज और निलंबित हैं। इसी तरह त्रिपुरा में तृणमूल विधायकों के पाला बदलने के संकेत पहले ही आ चुके थे। विपक्ष का हारना तय था, पर वह अपनी पूरी एकजुटता का इजहार करके जो संदेश दे सकता था उसमें चूक गया। दूसरी तरफ मोदी अपनी रणनीति में पूरी तरह कामयाब रहे। सभी गैर-राजग दल एकजुट नहीं हो पाए। राजग के उम्मीदवार को जद (यू) के अलावा बीजू जनता दल, अन्नाद्रमुक, तेलंगाना राष्ट्र समिति और वाइएसआर कांग्रेस का भी समर्थन मिला। लिहाजा, यह हैरत की बात नहीं कि कोविंद को अनुमान से कुछ अधिक वोट आए, 65.65 फीसद। मीरा कुमार को 34.35 फीसद वोट हासिल हुए।
कोविंद के रूप में दलित उम्मीदवार के आ जाने से विपक्ष हतप्रभ हो गया। आखिरकार कांग्रेस समेत सत्रह विपक्षी दलों को भी मीरा कुमार के रूप में दलित उम्मीदवार उतारना पड़ा। पर पहल करके मोदी बाजी मार चुके थे। इसका कितना लाभ मोदी को अगले लोकसभा चुनाव में मिलेगा, यह वक्त ही बताएगा, पर यह शायद उनकी राजनीतिक रणनीति का ही फल है कि देश में दूसरी बार एक दलित को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला है। केआर नारायणन पहले दलित थे जो राष्ट्रपति पद पर पहुंचे। प्रणब मुखर्जी के उत्तराधिकारी रामनाथ कोविंद सांसद और बिहार के राज्यपाल रह चुके हैं। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उनकी पृष्ठभूमि जगजाहिर है। अपनी जीत को उन्होंने एक महत उत्तरदायित्व के तौर पर रेखांकित किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह पद की गरिमा तथा संवैधानिक तकाजों के अनुरूप ही करेंगे।
