उत्तर प्रदेश में अपनी रही-सही साख बचाने में जुटी बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को करारा झटका लगा है। पार्टी संस्थापक कांशीराम के साथी और अल्पसंख्यक समुदाय के कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने निष्कासन के दूसरे दिन आरोप लगाया कि मायावती की पचास करोड़ रुपए की मांग पूरी न कर पाने पर उन्हें निकाला गया है। सिद्दीकी ने यह तक कहा कि मायावती मुसलिम समुदाय के प्रति नफरत रखती हैं और इस समय पूरी पार्टी महासचिव सतीशचंद्र मिश्रा की जागीर बन कर रह गई है। सिद््दीकी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मायावती से बाचतीत की कुछ आॅडियो क्लिपें भी जारी कीं और दावा किया कि उनके पास ऐसी डेढ़ सौ आॅडियो क्लिप हैं, जिनके सामने आने पर भूचाल आ जाएगा। इसके कुछ ही देर बाद मायावती ने सिद्दिकी को टैपिंग ब्लैकमेलर बता कर पलटवार करते हुए कहा कि सिद्दीकी ने पार्टी के चंदे की बड़ी रकम डकार ली। गौरतलब है कि निकाले जाने से पहले तक सिद््दीकी बसपा के एक बड़े नेता माने जाते थे। हालांकि उन पर भी मायावती के लिए वसूली करने और काले धन का हिसाब-किताब रखने का आरोप लगता रहा है। लंबे समय से वे मायावती के सबसे भरोसेमंद भी रहे। वे पार्टी का अल्पसंख्यक चेहरा भी थे। पर उनके निष्कासन से जाहिर है कि बसपा की ताकत लगातार क्षीण हो रही है।

उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बना चुकी और राष्ट्रीय स्तर की पार्टी रह चुकी बसपा की दुर्गति तब शुरू हुई, जब 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली। कभी अकेले दम पर बहुमत की सरकार बना चुकी इस पार्टी की हालत 2017 के विधानसभा चुनाव में और खस्ता हो गई, जब 403 सदस्यीय विधानसभा में उसे सिर्फ उन्नीस सीटें मिलीं। पर बसपा के भीतर जो कुछ हो रहा है, उसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। यह पार्टी सुप्रीमो मायावती की कार्यशैली का नतीजा है, जिसे पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। अस्सी के दशक में दलित समाज को गोलबंद करके कांशीराम ने जिस बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था, उसे बहुत जल्द मायावती ने अपने कब्जे में ले लिया। उसके बाद पार्टी में उभरते किसी भी ताकतवर नेता को उन्होंने बर्दाश्त नहीं किया। उन्होंने हर किसी का जब जैसा चाहा इस्तेमाल किया और उसके कानूनी जाल में फंसने पर फौरन उससे पिंड छुड़ा लिया।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मायावती पर भ्रष्टाचार के जरिए और प्रत्याशियों को टिकट बेच कर काफी पैसा बनाने का आरोप है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी उनकी पार्टी के एक खाते में करोड़ों की राशि पकड़ी गई थी। खुद को परिवारवाद का विरोधी बताने वाली पार्टी सुप्रीमो ने पिछले दिनों अपने भाई को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर पार्टी में दूसरे नंबर का दर्जा दे दिया। उन्हें अब दूसरे लोगों पर भरोसा नहीं रह गया है। कहां तो पार्टी को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करने पर विचार करना चाहिए था, कहां वह अपने अंदर के ही बंदरबांट और कलह में उलझ गई है। वह बसपा कहां है जो एक आंदोलन और मिशन होने का दावा करती थी? जाहिर है, बसपा का संकट सांगठनिक उतना नहीं है जितना नैतिक है।