माओवादी गतिविधियों में हुई गिरफ्तारियों के मसले पर काफी विवाद रहा है। मगर आमतौर पर जो बातें या आरोप अदालतों में साबित हो जाते हैं, उन्हें सच माना जाता है और सजा का आधार भी वही होता है। इस लिहाज से देखें तो महाराष्ट्र में गढ़चिरौली की सत्र अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर जीएन साईबाबा सहित चार अन्य लोगों को गैरकानूनी गतिविधियां (निवारक) कानून की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। साईबाबा के अलावा दोषी ठहराए गए लोगों में पांच और लोग शामिल हैं। इनमें विजय तिर्की को दस साल की सजा सुनाई गई है। इन सभी पर प्रतिबंधित संगठन सीपीआइ (माओवादी) से संबंध रखने और कथित रूप से माओवादी विचारधारा का प्रचार करने का आरोप सही पाया गया है।
सरकार का दावा है कि ये लोग विश्वविद्यालय या अकादमिक क्षेत्रों में रह कर माओवादी गतिविधियों में किसी न किसी रूप में मदद कर रहे थे।
इस मामले में पुलिस का यह भी दावा था कि नक्सलवाद को बढ़ावा देने के आरोप में 2009 में गिरफ्तार कोबाद गांधी ने साईबाबा का नाम लिया था। मगर बाद में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कोबाद गांधी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। बाद में उजागर हुए तथ्यों की जांच कर रही पुलिस ने पहले सितंबर 2013 में हेम मिश्रा और प्रशांत राही को पकड़ा था, फिर उनके बयानों के आधार पर मई 2014 में जीएन साईबाबा को गिरफ्तार किया। इसी के बाद पुलिस ने बरामद रिकॉर्ड का हवाला देते हुए इनके माओवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाया था।
इस मामले में सरकार की सख्ती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि साईबाबा के शारीरिक रूप से नब्बे प्रतिशत विकलांग होने के बावजूद वह उनकी जमानत का विरोध करती रही। पर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र सरकार के रवैए को बेहद संवेदनहीन बताया और उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया था। इस मसले पर काफी विवाद रहा और अन्य लोगों के अलावा साईबाबा के शारीरिक रूप से असमर्थ होने के आधार पर आरोप गलत होने के दावे किए गए। साईबाबा की पत्नी ने उन आरोपों में कोई दम न होने की बात कहते हुए उनकी रिहाई की उम्मीद की थी।
इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं है कि संबंधित पक्ष फैसले से असंतुष्ट होता है, तो उस पर ऊंची अदालतों में अपील दायर हो। पर अब जबकि अदालत ने उन आरोपों को सही बताते हुए छह लोगों को दोषी करार दिया और सजा सुनाई तो जाहिर है कि उसका कोई आधार रहा होगा। पिछले लंबे समय से सरकारें माओवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या बताती रही हैं।
माओवादी गतिविधियों से प्रभावित इलाकों में जन-जीवन की क्या हालत है, यह किसी से छिपा नहीं है। सरकारों की ओर से विकास के सवाल हाशिए पर रहने का नतीजा यह हुआ कि चरमपंथी विचारधारा वाले कुछ समूहों को अभाव के मारे लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने का मौका मिला। अब जब माओवाद एक गंभीर चुनौती के रूप में एक बड़े इलाके में अपने पांव पसार चुका है, तो उसके हल के लिए कानूनी सख्ती एक रास्ता हो सकता है। पर माओवाद को जड़ से कमजोर करने के लिए जरूरी है कि इससे प्रभावित इलाकों में स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर जमीनी सवालों से दो-चार हुआ जाए और पर्याप्त विकास पर ध्यान दिया जाए।

