उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाना सरकार के लिए शायद मुश्किल काम होता गया है। आए दिन कोई न कोई ऐसी घटना घट जाती है, जिससे सरकार को शर्मशार और विपक्ष के हमलों का शिकार होना पड़ता है। लखीमपुर खीरी में तीन साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार और फिर उसकी हत्या की घटना इसका ताजा उदाहरण है। लखीमपुर में पिछले बीस दिनों में बलात्कार और हत्या की यह तीसरी घटना है।
जाहिर है, पिछली घटनाओं में पुलिस कार्रवाई से अपराधियों ने कोई सबक नहीं लिया, उनके मन में कोई भय नहीं पैदा हुआ। समाज में पनपती ऐसी विकृति तो चिंता का विषय है ही कि तीन साल की अबोध बच्ची को भी कुंठित अपनी हवश का शिकार बनाने से बाज नहीं आते। पर यह कम चिंता की बात नहीं है कि उत्तर प्रदेश में अब अपराधियों के मन में पुलिस का कोई खौफ नहीं रह गया है। वे खुलेआम सड़क पर हथियार लहराते निकलते हैं और दिन दहाड़े किसी की हत्या करके फरार हो जाते हैं। कोई बच्ची अपना परीक्षा फार्म भरने घर से बाहर निकलती है और अपराधी उसे अगवा करके उसका बलात्कार और फिर हत्या कर देते हैं। ऐसे असुरक्षा भरे माहौल की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? स्वाभाविक ही इन घटनाओं से लोगों में आक्रोश है।
योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की कमान संभाली थी तो बढ़-चढ़ कर उसे अपराधमुक्त बनाने का दावा किया था। उन्होंने बार-बार दोहराया है कि अब इस प्रदेश में अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं बची है। अब या तो उनकी जगह जेल में है या फिर वे प्रदेश छोड़ कर भाग जाएंगे। मगर ऐसा कतई नहीं हुआ। शुरू के दिनों में वे आपराधिक घटनाओं का दोष पिछली सरकार के पाले हुए गुंडों पर डाल कर अपनी जिम्मेदारी से कुछ हद तक मुक्त होने की कोशिश करते रहे। पर अब करीब तीन साल बीत जाने के बावजूद प्रशासन उन अपराधियों पर काबू नहीं पा सका है, तो उसके कामकाज के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि प्रशासन को अपराधियों पर अंकुश कसने के तरीके नहीं पता हैं या वह ठान ले तो अपराध खत्म नहीं कर सकती। लखीमपुर खीरी की ताजा घटना में पुलिस ने चार टीमें गठित कर आरोपी को पकड़ लिया है। विकास दुबे के मामले में जब पुलिस ने तय कर लिया कि उसे मारना है, तो उसने वह कर दिखाया, बेशक उसकी उस कार्रवाई पर बहुत सारे सवाल उठे।
इसलिए यह मानना मुश्किल है कि प्रशासन की इच्छा के विरुद्ध अपराध पनपता रह सकता है। दरअसल, उत्तर प्रदेश में अपराध पर काबू न पाए जा पाने के पीछे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। अनेक मामलों से स्पष्ट है कि बहुत सारे अपराधियों के सत्तापक्ष और बड़े अधिकारियों से नजदीकी रही है। जब सत्तापक्ष खुद अपराधियों के प्रति लचीला या पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाएगा, तो प्रशासन उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से परहेज करेगा ही।
अपराध रोकने के लिए पुलिस को मुक्तहस्त करना पड़ेगा, अपराधियों के प्रति लगाव त्यागना पड़ेगा। सिर्फ चिह्नित करके उनमें खौफ नहीं पैदा किया जा सकता कि किस अपराधी की नजदीकी किस राजनीतिक दल से है। अपराधी किसी राजनीतिक दल के नहीं होते, वे अपने स्वार्थ और संरक्षण के लिए पार्टी बदल लिया करते हैं। इसलिए अगर योगी सरकार सचमुच प्रदेश को अपराधमुक्त बनाना चाहती है, तो उसे पुलिस के बंधे हाथ खोलने पड़ेंगे और उसकी जवाबदेही तय करनी होगी।
